||समर्थ रामदासांचा दासबोध दशक ७ ||
||दशक सातवा : चौदा ब्रह्मांचा ||७||
समास पहिला : मंगलाचरण
||श्रीराम ||
विद्यावंतांचा पूर्वजू | गजानन एकद्विजू |
त्रिनयन चतुर्भुजू | परशुपाणि ||१||
कुबेरापासून अर्थ | वेदांपासून परमार्थ |
लक्ष्मीपासून समर्थ | भाग्यासी आले ||२||
तैशी मंगळमूर्ती आद्या | तियेपासून झाल्या सकळ विद्या |
तेणें कवि लाघवगद्या | सत्पात्रें जाहलीं ||३||
जैशीं समर्थाचीं लेकुरें | नाना अलंकारीं सुंदरें |
मूळपुरुषाचेनि द्वारें | तैसे कवी ||४||
नमूं ऐशिया गणेंद्रा | विद्याप्रकाशपूर्णचंद्रा |
जयाचेनि बोधसमुद्रा | भरतें दाटे बळें ||५||
जो कर्तृत्वास आरंभ | मूळपुरुष मूळारंभ |
जो परात्पर स्वयंभ | आदि अंतीं ||६||
तयापासून प्रमदा | इच्छाकुमारी शारदा |
आदित्यापासून गोदा | मृगजळ वाहे ||७||
जे मिथ्या म्हणतांच गोंवी | मायिकपणें लाघवी |
वक्तयास वेढा लावी | वेगळेपणें ||८||
जे द्वैताची जननी | कीं ते अद्वैताची खाणी |
मूळमाया गवसणी | अनंत ब्रह्मांडांची ||९||
कीं ते अवडंबरी वल्ली | अनंत ब्रह्मांडें लगडली |
मूळपुरुषाची माउली | दुहितारूपें ||१०.
वंदूं ऐशी वेदमाता | आदिपुरुषाची जे सत्ता |
आतां आठवीन समर्था | सद्गुरूसी ||११||
जयाचेनि कृपादृष्टी | होय आनंदाची वृष्टी |
तेणें गुणें सर्व सृष्टी | आनंदमय ||१२||
कीं तो आनंदाचा जनक | सायुज्यमुक्तीचा नायक |
कैवल्यपददायक | अनाथबन्धू ||१३||
मुमुक्षचातकीं सुस्वर | करुणां पाहिजे अंबर |
वोळे कृपेचा जलधर | साधकांवरी ||१४||
कीं तें भवार्णवींचें तारूं | बोधें पाववी पैलपारू |
महाआवर्तीं आधारू | भाविकांसी ||१५||
कीं तो काळाचा नियंता | नाना संकटीं सोडविता |
कीं ते भाविकाची माता | परम स्नेहाळ ||१६||
कीं तो परत्रींचा आधारू | कीं तो विश्रांतीचा थारू |
नातरी सुखाचें माहेरू | सुखरूप ||१७||
ऐसा सद्गुरु पूर्णपणीं | तुटे भेदाची कडसणी |
देहेंविण लोटांगणीं | तया प्रभूसी ||१८||
साधु संत आणि सज्जन | वंदूनियां श्रोतेजन |
आतां कथानुसंधान | सावध ऐका ||१९||
संसार हाचि दीर्घ स्वप्न | लोभें वोसणती जन |
माझी कांता माझें धन | कन्या पुत्र माझे ||२०||
ज्ञानसूर्य मावळला | तेणें प्रकाश लोपला |
अंधकारें पूर्ण झाला | ब्रह्मगोळ अवघा ||२१||
नाहीं सत्वाचें चांदणें | कांहीं मार्ग दिसे जेणें |
सर्व भ्रांतीचेनि गुणें | आपेंआप न दिसे ||२२||
देहबुद्धिअहंकारे | निजले घोरती घोरे |
दुःखें आक्रंदती थोरे | विषयसुखाकारणें ||२३||
निजले असतांचि मेले | पुनः उपजतांच निजले |
ऐसे आले आणि गेले | बहुत लोक ||२४||
निदसुरेपणेंचि सैरावैरा | बहुतीं केल्या येरझारा |
नेणोनियां परमेश्वरा | भोगिले कष्ट ||२५||
त्या कष्टांचें निरसन | व्हावया पाहिजे आत्मज्ञान |
म्हणोनि हें निरूपण | अध्यात्मग्रंथीं ||२६||
सकळ विद्यामध्यें सार | अध्यात्मविद्येचा विचार |
दशमाध्यायीं शार्ङ्गधर | भगवद्गीतेंत बोलिला ||२७||
अध्यात्मविद्या विद्यानां वादः प्रवदतामहम् ||
याकारणें अद्वैतग्रंथ | अध्यात्मविद्येचा परमार्थ |
पावावया तोचि समर्थ | जो सर्वांगें श्रोता ||२८||
जयाचें चंचळ हृदय | तेणें ग्रंथ सोडूंचि नये |
सोडितां अलभ्य होय | अर्थ येथींचा ||२९||
जयास जोडला परमार्थ | तेणें पहावा हा ग्रंथ |
अर्थ शोधितां परमार्थ | निश्चयो बाणे ||३०||
जयास नाहीं परमार्थ | तयास न कळे येथींचा अर्थ |
नेत्रेंविण निधानस्वार्थ | अंधास न कळे ||३१||
एक म्हणती मराठें काये | हें तों भल्यानें ऐकों नये |
तीं मूर्खें नेणती सोयें | अर्थान्वयांची ||३२||
लोहाची मांदूस केली | नाना रत्नें सांठविलीं |
तीं अभाग्यानें त्यागिलीं | लोखंड म्हणोनि ||३३||
तैशी भाषा प्राकृत | अर्थ वेदांत आणि सिद्धांत |
नेणोनि त्यागिती भ्रांत | मंदबुद्धीस्तव ||३४||
अहाच सांपडतां धन | त्याग करणें मूर्खपण |
द्रव्य घ्यावें सांठवण | पाहोंचि नये ||३५||
परिस देखिला अंगणीं | मार्गीं सांपडला चिंतामणी |
अव्हा वेल महागुणी | कूपामध्यें ||३६||
तैसें प्राकृतीं अद्वैत | सुगम आणि सप्रचीत |
अध्यात्म लाभे अकस्मात | तरी अवश्य घ्यावें ||३७||
न करितां व्युत्पत्तीचा श्रम | सकळ शास्त्रार्थ होय सुगम |
सत्समागमाचें वर्म | तें हें ऐसें असे ||३८||
जें व्युत्पत्तीनें न कळे | तें सत्समागमें कळे |
सकळ शास्त्रार्थ आकळे | स्वानुभवासी ||३९||
म्हणोनि कारण सत्समागम | तेथें नलगे व्युत्पत्तिश्रम |
जन्मसार्थकाचें वर्म | वेगळेंचि असे ||४०||
भाषाभेदाश्च वर्तन्ते अर्थ एको न संशयः |
पात्रद्वये यथा खाद्यं स्वादभेदो न विद्यते ||१||
भाषापालटें कांहीं | अर्थ वाया जात नाहीं |
कार्यसिद्धि ते सर्वही | अर्थाचपासीं ||४१||
तथापि प्राकृताकरितां | संस्कृताची सार्थकता |
येऱ्हव्हीं त्या गुप्तार्था | कोण जाणे ||४२||
आतां असो हें बोलणें | भाषा त्यागून अर्थ घेणें |
उत्तम घेऊन त्याग करणें | सालीटरफलांचा ||४३||
अर्थ सार भाषा पोंचट | अभिमानें करवी खटपट |
नाना अहंतेनें वाट | रोधिली मोक्षाची ||४४||
शोध घेतां लक्ष्यांशाचा | तेथें आधीं वाच्यांश
कैंचा |
अगाध महिमा भगवंताचा | कळला पाहिजे ||४५||
मुकेपणाचें बोलणें | हें जयाचें तोचि जाणें |
स्वानुभवाचिये खुणें | स्वानुभवी पाहिजे ||४६||
अर्थ जाणे अध्यात्माचा | ऐसा श्रोता मिळेल कैंचा |
जयासि बोलतां वाचेचा | हव्यासचि पुरे ||४७||
परीक्षावंतापुढें रत्न | ठेवितां होय समाधान |
तैसें ज्ञानियापुढें ज्ञान | बोलावें वाटे ||४८||
मायाजाळें दुश्चित होय | तें निरूपणें कामा नये |
संसारिका कळे काय | अर्थ येथींचा ||४९||
व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनंदन |
बहुशाखा ह्यनंताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम् ||१||
व्यवसायी जो मळिण | त्यासि न कळे निरूपण |
येथें पाहिजे सावधपण | अतिशयेंसीं ||५०||
नाना रत्नें नाना नाणीं | दुश्चितपणें घेतां हानी |
परीक्षा नेणतां प्राणी | ठकला तेथें ||५१||
तैसें निरूपणीं जाणा | आहाच पाहतां कळेना |
मराठेंचि उमजेना | कांहीं केल्या ||५२||
जेथें निरूपणाचे बोल | आणि अनुभवाची ओल |
ते संस्कृतापरी सखोल | अध्यात्मश्रवण ||५३||
माया ब्रह्म वोळखावें | तयास अध्यात्म म्हणावें |
तरी तें मायेचें जाणावें | स्वरूप आधीं ||५४||
माया सगुण साकार | माया सर्व विकार |
माया जाणिजे विस्तार | पंचभूतांचा ||५५||
माया दृश्य दृष्टीस दिसे | मायाभास मनास भासे |
माया क्षणभंगुर नासे | विवेकें पाहतां ||५६||
माया अनेक विश्वरूप | माया विष्णूचें स्वरूप |
मायेची सीमा अमूप | बोलिजे तितुकी थोडी ||५७||
माया बहुरूप बहुरंग | माया ईश्वराचा संग |
माया पाहतां अभंग | अखिल वाटे ||५८||
माया सृष्टीची रचना | माया आपली कल्पना |
माया तोडितां तुटेना | ज्ञानेंविण ||५९||
ऐशी माया निरूपिली | स्वल्प संकेतें बोलिली |
पुढें वृत्ति सावध केली | पाहिजे श्रोतीं ||६०||
पुढें ब्रह्मनिरूपण | निरूपिलें ब्रह्मज्ञान |
जेणें तुटे मायाभान | एकसरें ||६१||
हरिः ॐ तत्सत् इति श्रीदासबोधे गुरुशिष्यसंवादे
सप्तमदशके मंगलाचरणनिरूपणं नाम प्रथमः समासः ||१||७. १
जय जय रघुवीर समर्थ ||
समास दुसरा : ब्रह्मनिरूपण
श्रीराम ||
ब्रह्म निर्गुण निराकार | ब्रह्म निःसंग निराकार |
ब्रह्मास नाहीं पारावार | बोलती साधू ||१||
ब्रह्म सर्वांस व्यापक | ब्रह्म अनेकीं एक |
ब्रह्म शाश्वत हा विवेक | बोलिला शास्त्रीं ||२||
ब्रह्म अच्युत अनंत | ब्रह्म सदोदित संत |
ब्रह्म कल्पनेरहित | निर्विकल्प ||३||
ब्रह्म दृश्यावेगळें | ब्रह्म शून्यत्वानिराळें |
ब्रह्म इन्द्रियांच्या मेळें | चोजवेना ||४||
ब्रह्म दृष्टीस दिसेना | ब्रह्म मूर्खास असेना |
ब्रह्म सद्गुरुविण येइना | अनुभवासी ||५||
ब्रह्म सकळांहूनि थोर | ब्रह्मा ऐसें नाहीं सार |
ब्रह्म सूक्ष्म अगोचर | ब्रह्मादिकांसी ||६||
ब्रह्म शब्दीं ऐसें तैसें | बोलिजे त्याहूनि अनारिसें |
परी तें श्रवणअभ्यासें | पाविजे ब्रह्म ||७||
ब्रह्मास नामें अनंत | परी तें ब्रह्म नामातीत |
ब्रह्मास हे दृष्टांत | देतां न शोभती ||८||
ब्रह्मासारिखें दुसरें | पाहतां काय आहे खरें |
ब्रह्मीं दृष्टांतउत्तरें | कदा न साहती ||९||
यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह ||
जेथें वाचा निवर्तती | मनास नाहीं ब्रह्मप्राप्ती |
ऐसें बोलिती श्रुती | सिद्धांतवचन ||१०||
कल्पनारूप मन पाहीं | ब्रह्मीं कल्पनाचि नाहीं |
म्हणोनि हें वाक्य कांहीं | अन्यथा नव्हे ||११||
आतां मनासि जें अप्राप्त | तें कैसेनि होईल प्राप्त |
ऐसें म्हणाल तरी कृत्य | सद्गुरुविण नाहीं ||१२||
भांडारगृहें भरलीं | परी असती आडकलीं |
हातास न येतां किल्ली | सर्वही अप्राप्त ||१३||
तरी ते किल्ली कवण | मज करावी निरूपण |
ऐसी श्रोता पुसे खूण | वक्तयासी ||१४||
सद्गुरुकृपा तेचि किल्ली | जेणें बुद्धी प्रकाशली |
द्वैतकपाटें उघडलीं | एकसरां ||१५||
तेथें सुख असे वाड | नाहीं मनासी पवाड |
मनेंविण कैवाड | साधनांचा ||१६||
त्याची मनाविण प्राप्ती | कीं वासनेविण तृप्ती |
तेथें न चले व्युत्पत्ती | कल्पनेची ||१७||
तें परेहुनी पर | मनबुद्धिअगोचर |
संग सोडितां सत्वर | पाविजे तें ||१८||
संग सोडावा आपुला | मग पहावें तयाला |
अनुभवी तो या बोला | सुखावेल गा ||१९||
आपण म्हणजे मीपण | मीपण म्हणजे जीवपण |
जीवपण म्हणजे अज्ञान | संग जडला ||२०||
सोडितां तया संगासी | ऐक्य होय निःसंगासी |
कल्पनेविण प्राप्तीसी | अधिकार ऐसा ||२१||
मी कोण ऐसें नेणिजे | तया नांव अज्ञान बोलिजे |
अज्ञान गेलिया पाविजे | परब्रह्म तें ||२२||
देहबुद्धीचें थोरपण | परब्रह्मीं न चले जाण |
तेथें होतसे निर्वाण | अहंभावासी ||२३||
ऊंच नीच नाहीं परी | रायारंका एकच सरी |
झाला पुरुष अथवा नारी | तरी एकचि पद ||२४||
ब्राह्मणांचें ब्रह्म तें सोंवळें | शूद्राचें ब्रह्म तें
ओंवळें |
ऐसें वेगळें आगळें | तेथें असेचिना ||२५||
ऊंच ब्रह्म तें रायासी | नीच ब्रह्म तें परिवारासी |
ऐसा भेद तयापाशीं | मुळींच नाहीं ||२६||
सकळांस मिळोन ब्रह्म एक | तेथें नाहीं अनेक |
रंक अथवा ब्रह्मादिक | तेथेंचि जाती ||२७||
स्वर्ग मृत्यु आणि पाताळ | तिहीं लोकींचे ज्ञाते सकळ |
सकळांसि मिळोनि एकचि स्थळ | विश्रांतीचें ||२८||
गुरुशिष्यां एकचि पद | तेथें नाहीं भेदाभेद |
परी या देहाचा संबंध | तोडिला पाहिजे ||२९||
देहबुद्धीच्या अंतीं | सकळांसि एकचि प्राप्ती |
एकं ब्रह्म द्वितीयं नास्ति | हें श्रुतीचें वचन ||३०||
साधु दिसती वेगळाले | परी ते स्वस्वरूपीं मिळाले |
अवघे मिळोनि एकचि झाले | देहातीत वस्तु ||३१.
ब्रह्म नाहीं नवें जुनें | ब्रह्म नाहीं अधिक उणें |
उणें भावील तें सुणें | देहबुद्धीचें ||३२||
देहबुद्धीचा संशयो | करी समाधानाचा क्षयो |
चुके समाधानसमयो | देहबुद्धियोगें ||३३||
देहाचें जें थोरपण | तेंचि देहबुद्धीचें लक्षण |
मिथ्या जाणोन विचक्षण | निंदिती देह ||३४||
देह पावे जंवरी मरण | तंवरी धरी देहाभिमान |
पुन्हा दाखवी पुनरागमन | देहबुद्धि मागुती ||३५||
देहाचेनि थोरपणें | समाधानासि आणिलें उणें |
देह पडेल कोण्या गुणें | हेंही कळेना ||३६||
हित आहे देहातीत | म्हणोनि निरूपिती संत |
देहबुद्धीनें अनहित | हो) ऊंचि लागे ||३७||
सामर्थ्यबळें देहबुद्धि | योगियांस तेही बाधी |
देहबुद्धीची उपाधी | पैसावों लागे ||३८||
म्हणोनि देहबुद्धि झडे | तरीच परमार्थ घडे |
देहबुद्धीनें बिघडे | ऐक्यता ब्रह्मींची ||३९||
विवेक वस्तूकडे ओढी | देहबुद्धि तेथूनि पाडी |
अहंता लावूनि निवडी | वेगळेपणें ||४०||
विचक्षणें याकारणें | देहबुद्धि त्यजावी श्रवणें |
सत्य ब्रह्मीं साचारपणें | मिळोन जावें ||४१||
सत्य ब्रह्म तें कवण | ऐसा श्रोता करी प्रश्न |
प्रत्युत्तर दे आपण | वक्ता श्रोतयासी ||४२||
म्हणे ब्रह्म एकचि असे | परी तें बहुविध भासे |
अनुभव देहीं अनारिसे | नाना मतीं ||४३||
जें जें जया अनुभवलें | तेंचि तयासी मानलें |
तेथेंचि त्याचें विश्वासलें | अंतःकरण ||४४||
ब्रह्म नामरूपातीत | असोनि नामें बहुत |
निर्मळ निश्चळ निवांत | निजानन्द ||४५||
अरूप अलक्ष अगोचर | अच्युत अनंत अपरंपार |
अदृश्य अतर्क्य अपार | ऐशीं नामें ||४६||
नादरूप ज्योतिरूप | चैतन्यरूप सत्तारूप |
स्वस्वरूप साक्षरूप | ऐशीं नामें ||४७||
शून्य आणि सनातन | सर्वेश्वर आणि सर्वज्ञ |
सर्वात्मा जगज्जीवन | ऐशीं नामें ||४८||
सहज आणि सदोदित | शुद्ध बुद्ध सर्वातीत |
शाश्वत आणि शब्दातीत | ऐशीं नामें ||४९||
विशाळ विस्तीर्ण विश्वंभर | विमळ वस्तु व्योमाकार |
आत्मा परमात्मा परमेश्वर | ऐशीं नामें ||५०||
परमात्मा ज्ञानघन | एकरूप पुरातन |
चिद्रूप चिन्मात्र जाण | नामें अनाम्याचीं ||५१||
ऐशीं नामें असंख्यात | परी तो परेश नामातीत |
त्याचा करावया निश्चितार्थ | ठेविलीं नामें ||५२||
तो विश्रांतीचा विश्राम | आदिपुरुष आत्माराम |
तें एकचि परब्रह्म | दुसरें नाहीं ||५३||
तेंचि कळावयाकारणें | चौदा ब्रह्मांचीं लक्षणें |
सांगिजेती तेणें श्रवणें | निश्चयो बाणे ||५४||
खोटें निवडितां एकसरें | उरलें तें जाणिजे खरें |
चौदा ब्रह्में शास्त्राधारें | बोलिजेती ||५५||
हरि ॐ तत्सत् इति श्रीदासबोधे गुरुशिष्यसंवादे
सप्तमदशके ब्रह्मनिरूपणं नाम द्वितीयः समासः ||२||७. २
समास तिसरा : चदुर्ध्शब्रह्मनिरूपण
श्रीराम ||
श्रोतां व्हावें सावधान | आतां सांगतों ब्रह्मज्ञान |
जेणें होये समाधान | साधकांचें ||१||
रत्नें साधाया कारणें | मृत्तिका लागे एकवटणें |
चौदा ब्रह्मांचीं लक्षणें | जाणिजे तैसीं ||२||
पदार्थेंविण संकेत | द्वैतावेगळा दृष्टांत |
पूर्वपक्षेंविण सिद्धांत | बोलतांचि नये ||३||
आधीं मिथ्या उभारावें | मग तें ओळखोन सांडावें |
पुढें सत्य तें स्वभावें | अंतरीं बाणे ||४||
म्हणोन चौदा ब्रह्मांचा संकेत | बोलिला कळावया सिद्धांत |
येथें श्रोतीं सावचित्त | क्षण एक असावें ||५||
पहिलें तें शब्दब्रह्म | दुजें ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म |
तिसरें खंब्रह्म | बोलिली श्रुती ||६||
चौथें जाण सर्वब्रह्म | पांचवें चैतन्यब्रह्म |
सहावें सत्ताब्रह्म | साक्षिब्रह्म सातवें ||७||
आठवें सगुणब्रह्म | नववें निर्गुण ब्रह्म |
दहावें वाच्यब्रह्म | जाणावें पैं ||८||
अनुभव तें अकरावें | आनंदब्रह्म तें बारावें |
तदाकार तें तेरावें | चौदावें अनिर्वाच्य ||९||
ऐशीं हीं चौदा ब्रह्में | यांचीं निरूपिलीं नामें |
आतां स्वरूपांचीं वर्में | संकेतें दावूं ||१०||
अनुभवेंविण भ्रम | या नां शब्दब्रह्म |
आतां ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म | तें एकाक्षर ||११||
खं शब्दें आकाशब्रह्म | महदाकाश व्यापक ब्रह्म |
आतां बोलिजेल सूक्ष्म ब्रह्म | सर्वब्रह्म ||१२||
पंचभूतांचें कुवाडें | जें जें तत्त्व दृष्टीस पडे |
तें तें ब्रह्मचि रोकडें | बोलिजेत आहे ||१३||
या नांव सर्वब्रह्म | श्रुतिआश्रयाचें वर्म |
आतां चैतन्यब्रह्म | बोलिजेल ||१४||
पंचभूतादि मायेतें | चैतन्यचि चेतवितें |
म्हणोनियां चैतन्यातें | चैतन्यब्रह्म बोलिजे ||१५||
चैतन्यास ज्याची सत्ता | तें सत्ताब्रह्म तत्त्वतां |
तये सत्तेस जाणता | या नांव साक्षिब्रह्म ||१६||
साक्षित्व जयापासूनी | तेंहीं आकळिलें गुणीं |
सगुणब्रह्म हे वाणी | तयासि वदे ||१७||
जेथें नाहीं गुणवार्ता | तें निर्गुणब्रह्म तत्त्वतां |
वाच्यब्रह्म तेंही आतां | बोलिजेल ||१८||
जे वाचे बोलतां आलें | तें वाच्यब्रह्म बोलिलें ||
अनुभवासि कथिलें | न वचे सर्वथा ||१९||
या नांव अनुभवब्रह्म | आनंदवृत्तीचा धर्म |
परंतु याचेंही वर्म | बोलवेना ||२०||
ऐसें हें ब्रह्म आनंद | तदाकार तें अभेद |
अनिर्वाच्य संवाद | तुटोनि गेला ||२१||
ऐशीं हीं चौदा ब्रह्में | निरूपिलीं अनुक्रमें |
साधकें पाहतां भ्रमें | बाधिजेना ||२२||
ब्रह्म जाणावें शाश्वत | माया तेचि अशाश्वत |
चौदा ब्रह्मांचा सिद्धांत | होईल आतां ||२३||
शब्दब्रह्म तें शाब्दिक | अनुभवेंविण मायिक |
शाश्वताचा विवेक | तेथें नाहीं ||२४||
जेथें क्षर ना अक्षर | तेथें कैंचें ओमित्येकाक्षर |
शाश्वताचा विचार | तेथें न दिसे ||२५||
खंब्रह्म ऐसें वचन | तरी शून्यातें नाशी ज्ञान |
शाश्वताचें अधिष्ठान | तेथें न दिसे ||२६||
सर्वत्रांस होतो अंत | हें तों प्रगटचि दिसत |
प्रळय बोलिला निश्चित | वेदांतशास्त्रीं ||२७||
ब्रह्मप्रळय मांडेल जेथें | भूतान्वय कैंचा तेथें |
म्हणोनिअ सर्वब्रह्मातें | नाश आहे ||२८||
अचळासी आणी चळण | निर्गुणास लावितां गुण |
आकारास विचक्षण | मानीतना ||२९||
जें निर्माण पंचभूत | तें प्रत्यक्ष नाशवंत |
सर्वब्रह्म हे मात | घडे केंवीं ||३०||
असो आतां हें बहुत | सर्वब्रह्म नाशवंत |
वेगळेपणास अंत | पाहणें कैंचें ||३१||
आतां जयास चेतवावें | तेंचि मायिक स्वभावें |
तेथें चैतन्याच्या नांवें | नाश आला ||३२||
परिवारेंविण सत्ता | ते सत्ता नव्हे तत्त्वतां |
पदार्थेंविण साक्षता | तेही मिथ्या ||३३||
सगुणास नाश आहे | प्रत्यक्षास प्रमाण काये |
सगुणब्रह्म निश्चयें | नाशवंत ||३४||
निर्गुण ऐसें जें नांव | त्या नांवास कैंचा ठाव |
गुणेंवीण गौरव | येईल कैंचें ||३५||
माया जैसें मृगजळ | ऐसें बोलती सकळ |
कां तें कल्पनेचें आभाळ | नाथिलेंचि ||३६||
ग्रामो नास्ति कुतः सीमा | जन्मेंविण जीवात्मा |
अद्वैतासी उपमा | द्वैताची असे ||३७||
मायेविरहित सत्ता | पदार्थाविण जाणता |
अविद्येविण चैतन्यता | कोणास आली ||३८||
सत्ता चैतन्यता साक्षी | सर्वही गुणांचिये पाशीं |
ठायींचें निर्गुण त्यासीं | गुण कैंचें ||३९||
ऐसें जें गुणरहित | तेथें नामाचा संकेत |
तोचि जाणावा अशाश्वत | निश्चयेंसीं ||४०||
निर्गुण ब्रह्मासी संकेतें | नामें ठेविलीं बहुतें |
तें वाच्यब्रह्म त्यातें | नाश आहे ||४१||
आनंदाचा अनुभव | हाही वृत्तीचाच भाव |
तदाकारीं ठाव | वृत्तीस नाहीं ||४२||
अनिर्वाच्य याकारणें | संकेतवृत्तीच्या गुणें |
तया संकेतास उणें | निवृत्तीनें आणिलें ||४३||
अनिर्वाच्य ते निवृत्ती | तेचि उन्मनीची स्थिती |
निरुपाधि विश्रांती | योगियांची ||४४||
वस्तु जे कां निरुपाधी | तेचि सहज समाधी |
जेणें तुटे आधिव्याधी | भवदुःखाची ||४५||
जो उपाधीचा अंत | तोचि जाणावा सिद्धांत |
सिद्धांत आणि वेदांत | धादांत आत्मा ||४६||
असो ऐसें जें शाश्वत ब्रह्म | जेथें नाहीं मायाभ्रम |
अनुभवी जाणे वर्म | स्वानुभवें ||४७||
आपुलेनि अनुभवें | कल्पनेसि मोडावें |
मग सुकाळीं पडावें | अनुभवाचे ||४८||
निर्विकल्पासि कल्पावें | कल्पना मोडे स्वभावें |
मग नसोनि असावें | कल्पकोटी ||४९||
कल्पनेचें एक बरें | मोहरितांच मोहरे |
स्वरूपीं घालितां भरे | निर्विकल्पीं ||५०||
निर्विकल्पास कल्पितां | कल्पनेचि नुरे वार्ता |
निःसंगास भेटों जातां | निःसंग होइजे ||५१||
पदार्था ऐसें ब्रह्म नव्हे | मा तें हातीं धरूनि द्यावें |
असो हें अनुभवावें | सद्गुरुमुखें ||५२||
पुढें कथेच्या अन्वयें | केलाचि करूं निश्चये |
जेणें अनुभवास ये | केवळ ब्रह्म ||५३||
हरि ॐ तत्सत् इति श्रीदासबोधे गुरुशिष्यसंवादे
सप्तमदशके चतुर्दशब्रह्मनिरूपणं नाम तृतीयः समासः ||३||७. ३
समास चवथा : विमलब्रह्मनिरूपण
श्रीराम ||
ब्रह्म नभाहूनि निर्मळ | पाहतां तैसेंचि पोकळ |
अरूप आणि विशाळ | मर्यादेवेगळें ||१||
एकवीस स्वर्गें सप्त पाताळ | मिळोन एक ब्रह्मगोळ |
ऐसें अनंत तें निर्मळ | व्यापून असे ||२||
अनंत ब्रह्मांडांखालतें | अनंत ब्रह्मांडांवरुतें |
तेणेंविण स्थळ रितें | अणुमात्र नाहीं ||३||
जळीं स्थळीं काष्ठीं पाषाणीं | ऐशी वदे लोकवाणी |
तेणेंविण रिता प्राणी | एकही नाहीं ||४||
जळचरां जैसें जळ | बाह्य अभ्यंतरीं निखळ |
तैसें ब्रह्म हें केवळ | जीवमात्रासी ||५||
जळावेगळा ठाव आहे | ब्रह्माबाहेरी जातां न ये |
म्हणोनि उपमा न साहे | जळाची तया ||६||
आकाशाबाहेरी पळों जातां | पुढें आकाशचि तत्त्वतां |
तैसा तया अनंता | अंतचि नाहीं ||७||
परी जें अखंड भेटलें | सर्वांगास लिगडिलें |
अति निकट परी चोरलें | सकळांसि जें ||८||
तयामध्येंचि असिजे | परी तयासी नेणिजे |
उपजे भास नुपजे | परब्रह्म तें ||९||
आकाशामध्यें आभाळ | तेणें आकाश वाटे डहुळ |
परी तें मिथ्या निवळ | आकाशचि असे ||१०||
नेहार देतां आकाशीं | चक्रें दिसती डोळ्यांसी |
तैसें दृश्य ज्ञानियांसी | मिथ्यारूप ||११||
मिथ्याचि परी आभासे | निद्रितांसी स्वप्न जैसें |
जागा झालिया आपैसें | बुझों लागे ||१२||
तैसें आपुलेनि अनुभवें | ज्ञानें जागृतीस यावें |
मग मायिक स्वभावें | कळों लागे ||१३||
आतां असो हें कुवाडें | जें ब्रह्मांडापैलीकडे |
तेंचि आतां निवाडें | उमजोन दावूं ||१४||
ब्रह्म ब्रह्मांडीं कालवलें | पदार्थमात्रासि व्यापून ठेलें |
सर्वांमध्यें विस्तारलें | अंशमात्रें ||१५||
ब्रह्मामध्यें सृष्टी भासे | सृष्टीमध्यें ब्रह्म असे |
अनुभव घेतां आभासे | अंशमात्रें ||१६||
अंशमात्रें सृष्टीभीतरीं | बाहेरी मर्यादा कोण करी |
सगळें ब्रह्म ब्रह्मांडोदरीं | माईल कैसें ||१७||
अमृतीमध्यें आकाश | सगळें सांठवतां प्रयास |
म्हणोन तयाचा अंश | बोलिजे तो ||१८||
ब्रह्म तैसें कालवलें | परी तें नाहीं हालवलें |
सर्वांत परी संचलें | संचलेपणें ||१९||
पंचभूतीं असे मिश्रित | परंतु तें पंचभूतातीत |
पंकीं आकाशीं अलिप्त | असोनि जैसें ||२०||
ब्रह्मास दृष्टांत न घडे | बुझावया देणें घडे |
परी दृष्टांतीं साहित्य पडे | विचारितां आकाश ||२१||
खंब्रह्म ऐशी श्रुती | गगनसदृशं हे स्मृती |
म्हणोन ब्रह्मास दृष्टांतीं | आकाश घडे ||२२||
काळिमा नसतां पितळ | मग तें सोनेंचि केवळ |
शून्यत्व नसतां निर्मळ | आकाश ब्रह्म ||२३||
म्हणोन ब्रह्म जैसें गगन | आणि माया जैसा पवन |
आढळे परी दर्शन | नव्हे त्याचें ||२४||
शब्दसृष्टीची रचना | होत जात क्षणक्षणां |
परंतु ते स्थिरावेना | वायूच ऐसी ||२५||
असो ऐशी माया मायिक | शाश्वत तें ब्रह्म एक |
पाहों जातां अनेक | व्यापून असे ||२६||
पृथ्वीसि भेदूनि आहे | परी तें ब्रह्म कठिण नव्हे |
दुजी उपमा न साहे | तया मृदुत्वासी ||२७||
पृथ्वीहूनि मृदु जळ | जळाहूनि तो अनळ |
अनळाहूनि कोमळ | वायु जाणावा ||२८||
वायूहूनि तें गगन | अत्यंतचि मृदु जाण |
गगनाहूनि मृदु पूर्ण | ब्रह्म जाणावें ||२९||
वज्रास असे भेदिलें | परी मृदुत्व नाहीं गेलें |
उपमेरहित संचलें | कठिण ना मृदु ||३०||
पृथ्वीमध्यें व्यापूनि असे | पृथ्वी नासे तें न नासे |
जळ शोषे तें न शोषे | जळीं असोनी ||३१||
तेजीं असे परी जळेना | पवनीं असे तरी चळेना |
गगनीं असे परी कळेना | परब्रह्म तें ||३२||
शरीरीं अवघें व्यापलें | परी तें नाहीं आढळलें |
जवळीच दुरावलें | नवल कैसें ||३३||
सन्मुखचि चहूंकडे | तयामध्यें पाहणें घडे |
बाह्याभ्यंतरीं रोकडें | सिद्धचि आहे ||३४||
तयांमध्येंचि आपण | आपणां सबाह्य तें जाण |
दृश्या वेगळी खूण | गगनासारिखी ||३५||
कांहीं नाहींसें वाटलें | तेथेंचि तें कोंदाटलें |
जैसें न दिसें आपुलें | आपणासि धन ||३६||
जो जो पदार्थ दृष्टीस पडे | तें त्या पदार्था पैलीकडे |
अनुभवे हें कुवाडें | उकलावें ||३७||
मागें पुढें आकाश | पदार्थेंविण जो पैस |
पृथ्वीविण भकाश | एकरूप ||३८||
जें जें रूप आणि नाम | तो तो नाथिलाचि भ्रम |
नामरूपातीत वर्म | अनुभवी जाणती ||३९||
नभीं धूम्राचे डोंगर | उचलती थोर थोर |
तैसें दावी वोडंबर | मायादेवी ||४०||
ऐशी माया अशाश्वत | ब्रह्म जाणावें शाश्वत |
सर्वांठायीं सदोदित | भरलें असे ||४१||
पोथी वाचूं जातां पाहे | मातृकामध्यें भरलें आहे |
नेत्रीं रिघोनियां राहे | मृदुपणें ||४२||
श्रवणें शब्द ऐकतां | मनें विचार पाहतां |
मना सबाह्य तत्त्वतां | परब्रह्म तें ||४३||
चरणीं चालतां मार्गीं | जें आडळे सर्वांगीं |
करें घेतां वस्तुलागीं | आडवें ब्रह्म ||४४||
असो इंद्रियसमुदाव | तयामध्यें वर्ते सर्व |
जाणों जातां मोडे हांव | इंद्रियांची ||४५||
जें जवळीच असे | पांहों जातां न दिसे |
न दिसोन वसे | कांहीं एक ||४६||
जें अनुभवेंचि जाणावें | सृष्टीचेनि अभावें |
आपुलेनि स्वानुभवें | पाविजे ब्रह्म ||४७||
ज्ञानदृष्टीचें देखणें | चर्मदृष्टी पाहों नेणे |
अंतरवृत्तीचिये खुणे | अंतरवृत्ति साक्ष ||४८||
जाणे ब्रह्म जाणे माया | जाणे अनुभवाच्या ठाया |
ते येक जाणावी तुर्या | सर्वसाक्षिणी ||४९||
साक्षत्व वृत्तीचें कारण | उन्मनी ते निवृत्ति जाण |
जेथें विरे जाणपण | विज्ञान तें ||५०||
जेथें अज्ञान सरे | ज्ञान तेंही नुरे |
विज्ञानवृत्ति मुरे | परब्रह्मीं ||५१||
ऐसें ब्रह्म शाश्वत | जेथें कल्पनेसी अंत |
योगिजना एकांत | अनुभवें जाणावा ||५२||
हरि ॐ तत्सत् इति श्रीदासबोधे गुरुशिष्यसंवादे
सप्तमदशके विमलब्रह्मनिरूपणं नाम चतुर्थः समासः ||४||७. ४
समास पांचवा : द्वैतकल्पनानिरसन
श्रीराम ||
केवळब्रह्म जें बोलिलें | तें अनुभवास आलें |
आणि मायेचेंहि लागलें | अनुसंधान ||१||
ब्रह्म अंतरीं प्रकाशे | आणि मायाही प्रत्यक्ष दिसे |
आतां हें द्वैत निरसे | कवणेपरी ||२||
तरी आतां सावधान | एकाग्र करूनियां मन |
मायाब्रह्म हें कवण | जाणताहे ||३||
सत्य ब्रह्माचा संकल्प | मिथ्या मायेचा विकल्प |
ऐशिया द्वैताचा जल्प | मनचि करी ||४||
जाणे ब्रह्म जाणे माया | ते येक जाणावी तुर्या |
सर्व जाणे म्हणोनियां | सर्वसाक्षिणी ||५||
ऐक तुर्येचें लक्षण | जेथें सर्व जाणपण |
सर्वचि नाहीं कवण | जाणेल गा ||६||
संकल्पविकल्पाची सृष्टी | जाली मनाचियें पोटीं |
तें मनचि मिथ्या शेवटीं | साक्षी कवणु ||७||
साक्षत्व चैतन्यत्वसत्ता | हे गुण ब्रह्माचिया माथां |
आरोपले जाण वृथा | मायागुणें ||८||
घटामठाचेनि गुणें | त्रिविधा आकाश हें बोलणें |
मायेचेनि खरेंपणें | गुण ब्रह्मीं ||९||
जंव खरेपण मायेसी | तंवचि साक्षित्व ब्रह्मासी |
मायेअविद्येचे निरासीं | द्वैत कैंचें ||१०||
म्हणोनि सर्वसाक्षी मन | तेंचि जालिया उन्मन |
मग तुर्यारूप ज्ञान | तें मावळोन गेलें ||११||
जयास द्वैत भासलें | तें मन उन्मन झालें |
द्वैताअद्वैतांचें तुटलें | अनुसंधान ||१२||
एवं द्वैत आणि अद्वैत | होये वृत्तीचा संकेत |
वृत्ति झालिया निर्वृत्त | द्वैत कैंचें ||१३||
वृत्तिरहित जें ज्ञान | तेंचि पूर्ण समाधान |
जेथें तुटे अनुसंधान | मायाब्रह्मींचें ||१४||
मायाब्रह्म ऐसा हेत | मनें कल्पिला संकेत |
ब्रह्म कल्पनेरहित | जाणती ज्ञानी ||१५||
जें मनबुद्धिअगोचर | जें कल्पनेहून पर |
तें अनुभवितां साचार | द्वैत कैंचें ||१६||
द्वैत पाहतां ब्रह्म नसे | ब्रह्म पाहतां द्वैत नासे |
द्वैताद्वैत भासे | कल्पनेसी ||१७||
कल्पना माया निवारी | कल्पना ब्रह्म थावरी |
संशय धरी आणि वारी | तेही कल्पना ||१८||
कल्पना करी बंधन | कल्पना दे समाधान |
ब्रह्मीं लावी अनुसंधान | तेही कल्पना ||१९||
कल्पना द्वैताची माता | कल्पनाचि ज्ञप्ति तत्त्वता |
बद्धता आणि मुक्तता | कल्पनागुणें ||२०||
कल्पना अंतरीं सबळ | नसते दावी ब्रह्मगोळ |
क्षण एक ते निर्मळ | स्वरूप कल्पी ||२१||
क्षण एक धोका वाहे | क्षण एक स्थिर राहे |
क्षण एक पाहे | विस्मित होउनी ||२२||
क्षण एकांत उमजे | क्षण एक निर्बुजे |
नाना विकार करिजे | ते कल्पना जाणावी ||२३||
कल्पना जन्माचें मूळ | कल्पना भक्तीचें फळ |
कल्पना तेचि केवळ | मोक्षदात्री ||२४||
असो ऐशी हे कल्पना | साधनें दे समाधाना |
येऱ्हवीं हे पतना | मूळच कीं ||२५||
म्हणोनि सर्वांचें मूळ | ते हे कल्पनाचि केवळ |
इचें केलिया निर्मूळ | ब्रह्मप्राप्ती ||२६||
श्रवण आणि मनन | निजध्यासें समाधान |
मिथ्या कल्पनेचें भान | उडोनि जाय ||२७||
शुद्ध ब्रह्माचा निश्चय | करी कल्पनेचा जय |
निश्चितार्थें संशय | तुटोनि जाय ||२८||
मिथ्या कल्पनेचें कोडें | कैसें राहे साचापुढें |
जैसें सूर्याचेनि उजेडें | नासे तम ||२९||
तैसें ज्ञानाचेनि प्रकाशें | मिथ्या कल्पना हे नासे |
मग हें तुटे आपैसें | द्वैतानुसंधान ||३०||
कल्पनेनें कल्पना उडे | जैसा मृगें मृग सांपडे |
कां शरें शर आतुडे | आकाशमार्गीं ||३१||
शुद्ध कल्पनेचें बळ | झालिया नासे शबल |
हेंचि वचन प्रंजळ | सावध ऐका ||३२||
शुद्ध कल्पनेची खूण | स्वयें कल्पिजे निर्गुण |
स्वस्वरूपीं विस्मरण | पडोंचि नेदी ||३३||
सदा स्वरूपानुसंधान | करी द्वैताचें निरसन |
अद्वैतनिश्चयाचें ज्ञान | तेचि शुद्ध कल्पना ||३४||
अद्वैत कल्पी ते शुद्ध | द्वैत कल्पी ते अशुद्ध |
अशुद्ध तेंचि प्रसिद्ध | शबल जाणावें ||३५||
शुद्ध कल्पनेचा अर्थ | अद्वैताचा निश्चितार्थ |
आणि शबल ते व्यर्थ | द्वैत कल्पी ||३६||
अद्वैतकल्पना प्रकाशे | तेच क्षणीं द्वैत नासे |
द्वैतासरिसी निरसे | शबलकल्पना ||३७||
कल्पनेनें कल्पना सरे | ऐसें जाणावें चतुरें |
शबल गेलियानंतरें | उरली ती शुद्ध ||३८||
शुद्ध कल्पनेचें रूप | तेंचि कल्पी स्वरूप |
स्वरूप कल्पितां तद्रूप | होय आपण ||३९||
कल्पनेसी मिथ्यत्व आलें | सहजचि तद्रूप झालें |
आत्मनिश्चयें नाशिलें | कल्पनेसी ||४०||
जेचि क्षणीं निश्चय चळे | तेचि क्षणीं द्वैत उफाळे |
जैसा अस्तमानीं प्रबळे | अंधकार ||४१||
तैसें ज्ञान होतां मलिन | अज्ञान प्रबळे जाण |
याकारणें श्रवण | अखंड असावें ||४२||
आतां असो हें बोलणें जालें | आशंका फेडूं येका बोलें |
जयास द्वैत भासलें | तें तूं नव्हेसी सर्वथा ||४३||
मागील आशंका फिटली | इतुकेन ही कथा संपली |
पुढें वृत्ति सावध केली | पाहिजे श्रोतीं ||४४||
हरिॐ तत्सत् इति श्रीदासबोधे गुरुशिष्यसंवादे
सप्तमदशके द्वैतकल्पनानिरसननिरूपणं नाम पंचमः
समासः ||५||७. ५
समास सहावा : बद्धमुक्तनिरूपण
श्रीराम ||
अद्वैतब्रह्म निरूपिलें | जें कल्पनेरहित संचलें |
क्षणएक तदाकार केलें | मज या निरूपणें ||१||
परी म्यां तदाकार व्हावें | ब्रह्मचि होऊन असावें |
पुनः संसारास न यावें | चंचळपणें सर्वथा ||२||
कल्पनारहित जें सुख | तेथें नाहीं संसारदुःख |
म्हणोनि तेंचि एक | होऊन असावें ||३||
ब्रह्मचि होइजे श्रवणें | पुन्हां वृत्तिवरी लागे येणें |
ऐसें सदा येणें जाणें | चुकेना कीं ||४||
मनें अंतरिक्षीं जावें | क्षणएक ब्रह्मचि व्हावें |
पुन्हां तेथून कोसळावें | वृत्तिवरी मागुती ||५||
प्रत्यावृत्ति सैरावैरा | किती करूं येरज़ारा |
पायीं लावूनियां दोरा | कीटक जैसा ||६||
उपदेशकाळीं तदाकार | होतां पडे हें शरीर |
अथवा नेणें आपपर | ऐसें झालें पाहिजे ||७||
ऐसें नसतां जें बोलणें | तेंचि वाटे लाजिरवाणें |
ब्रह्म होऊन संसार करणें | हेंही विपरीत दिसे ||८||
जो स्वयें ब्रह्मचि झाला | तो मागुता कैसा आला |
ऐसें ज्ञान माझें मजला | प्रशस्त न वाटे ||९||
ब्रह्मचि होऊन जावें | कां तें संसारीच असावें |
दोहींकडे भरंगळावें | किती म्हणोनि ||१०||
निरूपणीं ज्ञान प्रबळे | उठोन जातां तें मावळे |
मागुता काम क्रोध खवळे | ब्रह्मरूपासी ||११||
ऐसा कैसा ब्रह्म झाला | दोहींकडे अंतरला |
वोडगस्तपणेंचि गेला | संसार त्याचा ||१२||
घेतां ब्रह्मसुखाची गोडी | संसारिक मागें वोढी |
संसार करितां आवडी | ब्रह्मीं उपजे मागुती ||१३||
ब्रह्मसुख नेलें संसारें | संसार गेला ज्ञानद्वारें |
दोहीं अपुरीं पुरें | एकही नाहीं ||१४||
याकारणें माझें चित्त | चंचळ झालें दुश्चित |
काय करणें निश्चितार्थ | एकही नाहीं ||१५||
ऐसा श्रोता करी विनंती | आतां रहावें कोणे रीतीं |
म्हणे अखंड माझी मती | ब्रह्माकार नाहीं ||१६||
आतां याचें प्रत्युत्तर | वक्ता देईल सुंदर |
श्रोतीं व्हावें निरुत्तर | क्षण एक आतां ||१७||
ब्रह्मचि होऊन जे पडले | तेचि मुक्तिपदास गेले |
येर ते काय बुडाले | व्यासादिक ||१८||
श्रोता विनंती करी पुढती | शुक मुक्तो वामदेवो वा हे श्रुती |
दोघेचि मुक्त आदिअंतीं | बोलत असे ||१९||
वेदें बद्ध केले सर्व | मुक्त शुक वामदेव |
वेदवचनीं अभाव | कैसा धरावा ||२०||
ऐसा श्रोता वेदाधारें | देता झाला प्रत्युत्तरें |
दोघेचि मुक्त अत्यादरें | प्रतिपाद्य केले ||२१||
वक्ता बोले याउपरी | दोघेचि मुक्त सृष्टीवरी |
ऐसें बोलतां उरी | कोणास आहे ||२२||
बहु ऋषि बहु मुनी | सिद्ध योगी आत्मज्ञानी |
झाले पुरुष समाधानी | असंख्यात ||२३||
प्रऱ्हादनारदपराशरपुंडरीक-
व्यासांबरीषशुकशौनकभीष्मदाल्भ्यान् |
रुक्मांगदार्जुनवसिष्ठविभीषणादीन्
पुण्यानिमान्परमभागवतान्स्मरामि ||१||
कविर्हरिरंतरिक्षः प्रबुद्धः पिप्पलायनः |
आविर्होत्रोऽथ द्रुमिलश्चमसः करभाजनः ||२||
यांहीवेगळे थोर थोर | ब्रह्मा विष्णु महेश्वर |
आदिकरून दिगंबर | विदेहादिक ||२४||
शुक वामदेव मुक्त झाले | येर हे अवघेच बुडाले |
या वचनें विश्वासले | ते पढतमूर्ख ||२५||
तरी वेद कैसा बोलिला | तो काय तुम्हीं मिथ्या केला |
ऐकोन वक्ता देता झाला | प्रत्युत्तर ||२६||
वेद बोलिला पूर्वपक्ष | मूर्ख तेथेंचि लावी लक्ष |
साधु आणि व्युत्पन्न दक्ष | त्यांस हें न माने ||२७||
तथापि हें जरी मानलें | तरी वेदसामर्थ्य बुडालें |
वेदाचेनि उद्धरिलें | न वचे कोणा ||२८||
वेदाअंगीं सामर्थ्य नसे | तरी या वेदासि कोण पुसे |
म्हणोनि वेदीं सामर्थ्य असे | जन उद्धरावया ||२९||
वेदाक्षर घडे ज्यासी | तो बोलिजे पुण्यराशी |
म्हणोनि वेदीं सामर्थ्यासी | काय उणें ||३०||
वेद शास्त्र पुराण | भाग्यें झालिया श्रवण |
तेणें होइजे पावन | हें बोलती साधु ||३१||
श्लोक अथवा श्लोकार्ध | नाहीं तरी श्लोकपाद |
श्रवण होतां एक शब्द | नाना दोष जाती ||३२||
वेद शास्त्रीं पुराणीं | ऐशा वाक्यांच्या आयणी |
अगाध महिमा व्यासवाणी | वदोनि गेली ||३३||
एकाक्षर होतां श्रवण | तात्काळचि होइजे पावन |
ऐसें ग्रंथाचें महिमान | ठायीं ठायीं बोलिलें ||३४||
दोहींवेगळा तिजा नुद्धरे | तरी महिमा कैंचा उरे |
असो हें जाणिजे चतुरें | येरां गाथागोवी ||३५||
वेद शास्त्रें पुराणें | कैशीं होती अप्रमाणें |
दोघावांचूनि तिसरा कोणें | उद्धरावा ||३६||
म्हणसी काष्ठ होऊनि पडिला | तोचि एक मुक्त झाला |
शुक तोही अनुवादला | नाना निरूपणें ||३७||
शुक मुक्त ऐसें वचन | वेद बोलिला हें प्रमाण |
परी तो नव्हता अचेतन | ब्रह्माकार ||३८||
अचेतन ब्रह्माकार | असता शुक योगीश्वर |
तरी सारासार विचार | बोलणें न घडे ||३९||
जो ब्रह्माकार झाला | तो काष्ठ होऊन पडिला |
शुक भागवत बोलिला | परीक्षितीपुढें ||४०||
निरूपण हें सारासार | बोलिला पाहिजे विचार |
धांडोळावें चराचर | दृष्टांताकारणें ||४१||
क्षण एक ब्रह्मचि व्हावें | क्षण एक दृश्य धांडोळावें |
नाना दृष्टांतीं संपादावें | वक्तृत्वासी ||४२||
असो भागवतनिरूपण | शुक बोलिला आपण |
तया अंगीं बद्धपण | लावूं नये कीं ||४३||
म्हणोनि बोलतां चालतां | निचेष्टित पडिलें नसतां |
मुक्ति लाभे सायुज्यता | सद्गुरुबोधें ||४४||
येक मुक्त एक नित्यमुक्त | एक जाणावे जीवन्मुक्त |
येक योगी विदेहमुक्त | समाधानी ||४५||
सचेतन ते जीवन्मुक्त | अचेतन ते विदेहमुक्त |
दोहीवेगळे नित्यमुक्त | योगेश्वर जाणावे ||४६||
स्वरूपबोधें स्तब्धता | ते जाणावी तटस्थता |
तटस्थता आणि स्तब्धता | हा देहसंबंध ||४७||
येथें अनुभवासीच कारण | येर सर्व निष्कारण |
तृप्ति पावावी आपण | आपुल्या स्वानुभवें ||४८||
कंठमर्याद जेविला | त्यास म्हणती भुकेला |
तेणें शब्दें जाजावला | हें तों घडेना ||४९||
स्वरूपीं नाहीं देह | तेथें कायसा संदेह |
बद्ध मुक्त ऐसा भाव | विदेहाचकडे ||५०||
देहबुद्धी धरून चिंतीं | मुक्त ब्रह्मादिक नव्हेती |
तेथें शुकाची कोण गती | मुक्तपणाची ||५१||
मुक्तपण हेंचि बद्ध | मुक्त बद्ध हें अबद्ध |
स्वस्वरूप स्वतःसिद्ध | बद्ध ना मुक्त ||५२||
मुक्तपणाची पोटीं शिळा | बांधतां जाइजे पाताळा |
देहबुद्धीची अर्गळा | स्वरूपीं न संटे ||५३||
मीपणापासून सुटला | तोचि एक मुक्त जाहला |
मुका अथवा बोलिला | तरी तो मुक्त ||५४||
जयास बांधावें तें वाव | तेथें कैंचा मुक्तभाव |
पाहों जातां सकळ वाव | गुणवार्ता ||५५||
बद्धो मुक्त इति व्याख्या गुणतो न मे वस्तुतः |
गुणस्य मायामूलत्वान्न मे मोक्षो न बंधनम् ||१||
तत्त्वज्ञाता परमशुद्ध | तयासि नाहीं मुक्त बद्ध |
मुक्त बद्ध हा विनोद | मायागुणें ||५६||
जेथें नाम रूप हें सरे | तेथें मुक्तपण कैंचें उरे |
मुक्त बद्ध हें विसरे | विसरपणेंशीं ||५७||
बद्ध मुक्त झाला कोण | ऐसा श्रोता करी प्रश्न |
बाधक जाणावें मीपण | धर्त्यास बाधी ||५८||
एवं हा अवघा श्रम | अहंतेचा जाण भ्रम |
मायातीत जो विश्राम | सेविला नाहीं ||५९||
असो बद्धता आणि मुक्तता | आली कल्पनेच्या माथां |
ते कल्पना तरी तत्त्वतां | साच आहे ||६०||
म्हणोनि हें मृगजळ | माया नाथिलें आभाळ |
स्वप्न मिथ्या तात्काळ | जागृतीस होय ||६१||
स्वप्नीं बद्ध मुक्त झाला | तो जागृतीस नाहीं आला |
कैंचा कोण काय झाला | कांहीं कळेना ||६२||
म्हणोन मुक्त विश्वजन | जयांस झालें आत्मज्ञान |
शुद्धज्ञानें मुक्तपण | समूळ वाव ||६३||
बद्ध मुक्त हा संदेह | धरी कल्पनेचा देह |
साधु सदा निःसंदेह | देहातीत वस्तु ||६४||
आतां असो हें पुढती | पुढें रहावें कोणें रीतीं |
तेंचि निरूपण श्रोतीं | सावध परिसावें ||६५||
हरि ॐ तत्सत् इति श्रीदासबोधे गुरुशिष्यसंवादे
सप्तमदशके बद्धमुक्तनिरूपणं नाम षष्ठः समासः ||६||७. ६
जय जय रघुवीर समर्थ ||
समास सातवा : साधनप्रतिष्ठानिरूपण
श्रीराम ||
वस्तूसि जरी कल्पावें | तरी ते निर्विकल्प स्वभावें |
तेथें कल्पनेच्या नावें | शून्याकार ||१||
तथापि कल्पूं जातां | न ये कल्पनेच्या हाता |
ओळखी ठायीं न पडे चित्ता | भ्रंश पडे ||२||
कांहीं दृष्टीस न दिसे | मनास तेही न भासे |
न भासे न दिसे | कैंसें ओळखावें ||३||
पाहों जातां निराकार | मनासि पडे शून्याकार |
कल्पूं जातां अंधकार | भरला वाटे ||४||
कल्पूं जातां वाटे काळें | परी ते काळें ना पिंवळें |
आरक्त निळें ना ढवळें | वर्णरहित ||५||
जयास वर्णव्यक्ति नसे | भासाहूनि अनारिसें |
रूपचि नाहीं कैसें | ओळखावें ||६||
न दिसतां ओळखण | किती धरावी आपण |
हें तों श्रमासीच कारण | होत असे ||७||
जो निर्गुण गुणातीत | जो अदृश्य अव्यक्त |
जो अचिंत्य चिंतनातीत | परमपुरुष ||८||
अचिंत्याव्यक्तरूपाय निर्गुणाय गुणात्मने |
समस्तजगदाधारमूर्तये ब्रह्मणे नमः ||१||
अचिंत्य तें चिंतावें | अव्यक्तास आठवावें |
निर्गुणास ओळखावें | कोणेपरी ||९||
जें दृष्टीसचि न पडे | जें मनासही नातुडे |
तया कैसें पाहणें घडे | निर्गुणासी ||१०||
असंगाचा संग धरणें | निरवलंबीं वास करणें |
निःशब्दासी अनुवादणें | कोणेपरी ||११||
अचिंत्यासि चिंतूं जातां | निर्विकल्पासि कल्पितां |
अद्वैताचें ध्यान करितां | द्वैतचि उठे ||१२||
आतां ध्यानचि सांडावें | अनुसंधान तें मोडावें |
तरी मागुतें पडावें | महासंशयीं ||१३||
द्वैताच्या भेणें अंतरीं | वस्तु न पाहिजे तरी |
तेणें समाधाना उरी | कदा असेचिना ||१४||
सवे लावितां सवे पडे | सवे पडतां वस्तु आतुडे |
नित्यानित्यविचारें घडे | समाधान ||१५||
वस्तु चिंतितां द्वैत उपजे | सोडी करितां कांहींच नुमजे |
शून्यत्वें संदेहीं पडिजे | विवेकेंविण ||१६||
म्हणोनि विवेक धरावा | ज्ञानें प्रपंच सारावा |
अहंभाव ओसरावा | परी तो ओसरेना ||१७||
परब्रह्म तें अद्वैत | कल्पितांच उठे द्वैत |
तेथें हेतु आणि दृष्टांत | कांहींच न चले ||१८||
तें आठवितां विसरिजे | कां तें विसरोन आठविजे |
जाणोनियां नेणिजे | परब्रह्म तें ||१९||
त्यास न भेटतां होय भेटी | भेटों जातां पडे तुटी |
ऐसी हे नवल गोष्टी | मुकेपणाची ||२०||
तें साधूं जातां साधवेना | नातरी सोडितां सुटेना |
लागला संबंध तुटेना | निरंतर ||२१||
तें असतचि सदा असे | नातरी पाहतां दुराशे |
न पाहतां प्रकाशे | जेथें तेथें ||२२||
जेथें अपाय तेथें उपाय | आणि उपाय तोचि अपाय |
हें अनुभवेंविण काय | उमजों जाणे ||२३||
तें नुमजतांचि उमजे | उमजोन कांहींच नुमजे |
तें वृत्तिविण पाविजे | निवृत्तिपद ||२४||
तें ध्यानीं धरितां नये | चिंतनीं चिंतावें तें काये |
मनामध्यें न समाये | परब्रह्म तें ||२५||
त्यास उपमे द्यावें जळ | तरी तें निर्मळ निश्चळ |
विश्व बुडालें सकळ | परी तें कोरडेंचि असे ||२६||
नव्हे प्रकाशासारिखें | अथवा नव्हे काळोखें |
आतां तें कासयासारिखें | सांगावें हो ||२७||
ऐसें ब्रह्म निरंजन | कदा नव्हे दृश्यमान |
लावावें तें अनुसंधान | कोणे परी ||२८||
अनुसंधान लावूं जातां | कांहीं नाहीं वाटे आतां |
नेणे मनाचिये माथां | संदेह वाजे ||२९||
लटिकेंचि काय पहावें | कोठें जाऊन रहावें |
अभाव घेतला जीवें | सत्यस्वरूपाचा ||३०||
अभावचि म्हणों सत्य | तरी वेद शास्त्रें कैसें मिथ्य |
आणि व्यासादिकांचें कृत्य | वाउगें नव्हे ||३१||
म्हणोनि मिथ्या म्हणतां नये | बहुत ज्ञानाचे उपाय |
बहुतीं निर्मिलीं तें काय | मिथ्या म्हणावें ||३२||
अद्वैतज्ञानाचा उपदेश | गुरुगीता तो महेश |
सांगतां होय पार्वतीस | महाज्ञान ||३३||
अवधूत गीता केली | गोरक्षास निरूपिली |
ते अवधूतगीता बोलिली | ज्ञानमार्ग ||३४||
विष्णु होऊन राजहंस | विधीस केला उपदेश |
ते हंसगीता जगदीश | बोलिला स्वमुखें ||३५||
ब्रह्मा नारदातें उपदेशित | चतुःश्लोकी भागवत |
पुढें व्यासमुखें बहुत | विस्तारलें ||३६||
वासिष्ठसार वसिष्ठ ऋषी | सांगता झाला रघुनाथासी |
कृष्ण सांगे अर्जुनासी | सप्तश्लोकी गीता ||३७||
ऐसें सांगावें तें किती | बहुत ऋषि बोलिले बहुतीं |
अद्वैतज्ञान आदि अंतीं | सत्यचि असे ||३८||
म्हणोन मिथ्या आत्मज्ञान | म्हणतां पाविजे पतन |
प्रज्ञेरहित ते जन | तयांस हें कळेना ||३९||
जेथें शेषाची प्रज्ञा मंदली | श्रुतीस मौनमुद्रा पडिली |
जाणपणें न वचे वदली | स्वरूपस्थिती ||४०||
आपणास नुमजे बरवें | म्हणोनि मिथ्या कैसें करावें |
नातरी सुदृढ धरावें | सद्गुरुमुखें ||४१||
मिथ्या तेंचि सत्य झालें | सत्य असोनि मिथ्या केलें |
संदेहसागरीं बुडालें | अकस्मात मन ||४२||
मनास कल्पायाची सवे | मनें कल्पिलें तें नव्हे |
तेणें गुणें संदेह धांवे | मीपणाचेनि पंथें ||४३||
तरी तो पंथचि मोडावा | मग परमात्मा जोडावा |
समूळ संदेह तोडावा | साधूचेनि संगतीं ||४४||
मीपण शस्त्रें तुटेना | मीपण फोडितां फुटेना |
मीपण सोडितां सुटेना | कांहीं केल्या ||४५||
मीपणें वस्तु नाकळे | मीपणें भक्ति मावळे |
मीपणें शक्ति गळे | वैराग्याची ||४६||
मीपणें प्रपंच न घडे | मीपणें परमार्थ बुडे |
मीपणें सकळही उडे | यश कीर्ति प्रताप ||४७||
मीपणें मैत्री तुटे | मीपणें प्रीति आटे |
मीपणें लिगटे | अभिमान अंगीं ||४८||
मीपणें विकल्प उठे | मीपणें कलह सुटे |
मीपणें संमोह फुटे | ऐक्यतेचा ||४९||
मीपण कोणासीच न साहे | तें भगवंतीं कैसेनि साहे |
म्हणून मीपण सांडून राहे | तोचि समाधानी ||५०||
मीपण कैसें त्यागावें | ब्रह्म कैसें अनुभवावें |
समाधान कैसें पावावें | निःसंगपणें ||५१||
मीपण जाणोनि त्यागावें | ब्रह्म होऊन अनुभवावें |
समाधान तें पावावें | निःसंगपणे ||५२||
आणीक एक समाधान | मीपणेंविण साधन |
करूं जाणे तोचि धन्य | समाधानी ||५३||
मी ब्रह्मचि झालों स्वतां | साधन करील कोण आतां |
ऐसें मनीं कल्पूं जातां | कल्पनाचि उठे ||५४||
ब्रह्मीं कल्पना न साहे | तेचि तेथें उभी राहे |
तयेसी शोधूनि पाहे | तोचि साधु ||५५||
निर्विकल्पासि कल्पावें | परी कल्पिलें तें आपण न व्हावें |
मीपणास त्यागावें | येणें रीतीं ||५६||
ब्रह्मविद्येच्या लपणीं | कांहींच न व्हावें असोनी |
दक्ष आणि समाधानी | तोचि हें जाणें ||५७||
जयास आपण कल्पावें | तेंचि आपण स्वभावें |
येथें कल्पनेच्या नांवें | शून्य आलें ||५८||
पदींहून चळों नये | करावे साधनउपाये |
तरीच सांपडे सोये | अलिप्तपणाची ||५९||
राजा राजपदीं असतां | उगीच चाले सर्व सत्ता |
साध्यचि होऊन तत्त्वतां | साधन करावें ||६०||
साधन आलें देहाच्या माथां | आपण देह नव्हे सर्वथा |
ऐसा करून अकर्ता | सहजचि आहे ||६१||
देह आपण ऐसें कल्पावें | तरीच साधन त्यागावें |
देहातीत असतां स्वभावें | देह कैंचा ||६२||
ना तें साधन ना तें देह | आपण आपला निःसंदेह |
देहींच असोन विदेह | स्थिति ऐशी ||६३||
साधनेंविण ब्रह्म होतां | लागों पाहे देहममता |
आळस प्रबळे तत्त्वतां | ब्रह्मज्ञानमिसें ||६४||
परमार्थमिसें अर्थ जागे | ध्यानमिसें निद्रा लागे |
मुक्तिमिसें दोष भोगे | अनर्गळता ||६५||
निरूपणमिसें निंदा घडे | संवादमिसें विवाद पडे |
उपाधिमिसें येऊन जडे | अभिमान अंगीं ||६६||
तैसा ब्रह्मज्ञानमिसें | आळस अंतरीं प्रवेशे |
म्हणे साधनाचें पिसें | काय करावें ||६७||
किं करोमि क्व गच्छामि किं गृह्णामि त्यजामि किम् |
आत्मना पूरितं सर्वं महाकल्पांबुना यथा ||१||
वचन आधारीं लाविलें | जैसें शस्त्र फिरविलें |
स्वतां हाणोनि घेतलें | जयापरी ||६८||
तैसा उपायाचा अपाय | विपरीतपणें स्वहित जाय |
साधन सोडितां होय | मुक्तपणें बद्ध ||६९||
साधन करितांच सिद्धपण | हातींचें जाईल निघोन |
तेणेंगुणें साधन | करूंच नावडे ||७०||
लोक म्हणती हा साधक | हेचि लज्जा वाटे एक |
साधन करिती ब्रह्मादिक | हें ठाउकें नाहीं ||७१||
आतां असो हे अविद्या | अभ्याससारिणी विद्या |
अभ्यासें पाविजे आद्या | पूर्ण ब्रह्म ||७२||
अभ्यास करावा कवण | ऐसा श्रोता करी प्रश्न |
परमार्थाचें साधन | बोलिलें पाहिजे ||७३||
याचें उत्तर श्रोतयासी | दिधलें पुढियलें समासीं |
निरूपिलें साधनासी | परमार्थाच्या ||७४||
हरि ॐ तत्सत् इति श्रीदासबोधे गुरुशिष्यसंवादे
सप्तमदशके साधनप्रतिष्ठानिरूपणं नाम सप्तमः समासः ||७||७. ७
समास आठवा : श्रवणनिरूपण
श्रीराम ||
ऐक परमार्थाचें साधन | जेणें होय समाधान |
तें तूं जाण गा श्रवण | निश्चयेंसीं ||१||
श्रवणें आतुडे भक्ती | श्रवणें उद्भवे विरक्ती |
श्रवणें तुटे आसक्ती | विषयांची ||२||
श्रवणें घडे चित्तशुद्धी | श्रवणें होय दृढ बुद्धी |
श्रवणें तुटे उपाधी | अभिमानाची ||३||
श्रवणें निश्चयो घडे | श्रवणें ममता मोडे |
श्रवणें अंतरीं जोडे | समाधान ||४||
श्रवणें आशंका फिटे | श्रवणें संशयो तुटे |
श्रवण होतां पालटे | पूर्वगुण आपुला ||५||
श्रवणें आवरे मन | श्रवणें घडे समाधान |
श्रवणें तुटे बंधन | देहबुद्धीचें ||६||
श्रवणें मीपण जाये | श्रवणें धोका न ये |
श्रवणें नाना अपाये | भस्म होती ||७||
श्रवणें होय कार्यसिद्धि | श्रवणें लागे समाधी |
श्रवणें घडे सर्व सिद्धी | समाधानासी ||८||var साधनांची
सत्संगावरी श्रवण | तेणें कळे निरूपण |
श्रवणें होईजे आपण | तदाकार ||९||
श्रवणें प्रबोध वाढे | श्रवणें प्रज्ञा चढे |
श्रवणें विषयांचे वोढे | तुटोन जाती ||१०||
श्रवणें विचार कळे | श्रवणें ज्ञान हें प्रबळे |
श्रवणें वस्तु निवळे | साधकांसी ||११||
श्रवणें सद्बुद्धि लागे | श्रवणें विवेक जागे |
श्रवणें मन हें मागे | भगवंतासी ||१२||
श्रवणें कुसंग तुटे | श्रवणें काम ओहटे |
श्रवणें धोका आटे | एकसरां ||१३||
श्रवणें मोह नासे | श्रवणें स्फूर्ति प्रकाशे |
श्रवणें सद्वस्तु भासे | निश्चयात्मक ||१४||
श्रवणें होय उत्तम गती | श्रवणें आतुडे शांती |
श्रवणें पाविजे निवृत्ती | अचळपद ||१५||
श्रवणा- ऐसें सार नाहीं | श्रवणें घडे सर्व कांहीं |
भवनदीच्या प्रवाहीं | तरणोपाय श्रवणें ||१६||
श्रवण भजनाचा आरंभ | श्रवण सर्वीं सर्वारंभ |
श्रवणें होय स्वयंभ | सर्व कांहीं ||१७||
प्रवृत्ति अथवा निवृत्ति | श्रवणेंविण न घडे प्राप्ती |
हे तों सकळांस प्रचीती | प्रत्यक्ष आहे ||१८||
ऐकिल्याविण कळेना | हें ठाउकें आहे जनां |
त्याकारणें मूळ प्रयत्ना | श्रवण आधीं ||१९||
जें जन्मीं ऐकिलेंचि नाहीं | तेथें पडिजे संदेहीं |
म्हणोनिया दुजें कांहीं | साम्यता न घडे ||२०||
बहुत साधनें पाहतां | श्रवणास न घडे साम्यता |
श्रवणेंविण तत्त्वता | कार्य न चले ||२१||
न देखतां दिनकर | पडे अवघा अंधकार |
श्रवणेंविण प्रकार | तैसा होय ||२२||
कैशी नवविधा भक्ती | कैशी चतुर्विधा मुक्ती |
कैशी आहे सहजस्थिती | हें श्रवणेंविण न कळे ||२३||
न कळे षट्कर्माचरण | न कळे कैसें पुरश्चरण |
न कळे कैसें उपासन | विधियुक्त ||२४||
नाना व्रतें नाना दानें | नाना तपें नाना साधनें |
नाना योग तीर्थाटणें | श्रवणेंविण न कळती ||२५||
नाना विद्या पिंडज्ञान | नाना तत्त्वांचें शोधन |
नाना कळा ब्रह्मज्ञान | श्रवणेंविण न कळे ||२६||
अठरा भार वनस्पती | एक्या जळें प्रबळती |
एक्या रसें उत्पत्ती | सकळ जीवांची ||२७||
सकळ जीवांस एक पृथ्वी | सकळ जीवांस एक रवी |
सकळ जीवांस वर्तवी | एक वायु ||२८||
सकळ जीवांस एक पैस | जयास बोलिजे आकाश |
सकळ जीवांचा वास | एक परब्रह्मीं ||२९||
तैसें सकळ जीवांस मिळोन | सार एकचि साधन |
तें हें जाण श्रवण | प्राणिमात्रांसीं ||३०||
नाना देश भाषा मतें | भूमंडळीं असंख्यातें |
सर्वांस श्रवणापरतें | साधनचि नाहीं ||३१||
श्रवणें घडे उपरती | बद्धाचे मुमुक्षु होती |
मुमुक्षूचे साधक अती | नेमेंसिं चालती ||३२||
साधकांचे होति सिद्ध | अंगीं बाणतां प्रबोध |
हें तों आहे प्रसिद्ध | सकळांस ठाउकें ||३३||
ठायींचे खळ चांडाळ | तेचि होती पुण्यशीळ |
ऐसा गुण तात्काळ | श्रवणाचा ||३४||
जो दुर्बुद्धि दुरात्मा | तोचि होय पुण्यात्मा |
अगाध श्रवणाचा महिमा | बोलिला न वचे ||३५||
तीर्थव्रतांची फळश्रुती | पुढें होणार सांगती |
तैसें नव्हे हातींच्या हातीं | सप्रचीत श्रवणें ||३६||
नाना रोग नाना व्याधी | तत्काळ तोडिजे औषधी |
तैशी आहे श्रवणसिद्धी | अनुभवी जाणती ||३७||
श्रवणाचा विचार कळे | तरीच भाग्यश्री प्रबळे |
मुख्य परमात्मा आकळे | स्वानुभवासी ||३८||
या नांव जाणावें मनन | अर्थालागीं सावधान |
निदिध्यासें समाधान | होत असे ||३९||
बोलिल्याचा अर्थ कळे | तरीच समाधान निवळे |
अकस्मात अंतरीं वोळे | निःसंदेह ||४०||
संदेह जन्माचें मूळ | तें श्रवणें होय निर्मूळ |
पुढें सहजचि प्रांजळ | समाधान ||४१||
जेथें नाहीं श्रवण मनन | तेथें कैंचें समाधान |
मुक्तपणाचें बंधन | जडलें पायीं ||४२||
मुमुक्षु साधक अथवा सिद्ध | श्रवणेंविण तो बद्ध |
श्रवणमननें शुद्ध | चित्तवृत्ति होय ||४३||
जेथें नाहीं नित्य श्रवण | तें जाणावें विलक्षण |
तेथें साधकें एक क्षण | क्रमूं नये सर्वथा ||४४||
जेथें नाहीं श्रवणस्वार्थ | तेथें कैंचा हो परमार्थ |
मागें केलें तितुकें व्यर्थ | श्रवणेंविण होय ||४५||
तस्मात् श्रवण करावें | साधन मनीं धरावें |
नित्य नेमें तरावें | संसारसागरीं ||४६||
सेविलेंचि सेवावें अन्न | घेतलेंचि घ्यावें जीवन |
तैसें श्रवण मनन | केलेंचि करावें ||४७||
श्रवणाचा अनादर | आळस करी जो नर |
त्याचा होय अपहार | स्वहिताविषयीं ||४८||
आळसाचें संरक्षण | परमार्थाची बुडवण |
याकारणें नित्य श्रवण | केलेंचि पाहिजे ||४९||
आतां श्रवण कैसें करावें | कोण्या ग्रंथास पाहावें |
पुढिलिये समासीं आघवें | सांगिजेल ||५०||
हरि ॐ तत्सत् इति श्रीदासबोधे गुरुशिष्यसंवादे
सप्तमदशके श्रवणनिरूपणं नाम अष्टमः समासः ||८||७. ८
समास नववा : श्रवणनिरूपण
श्रीराम ||
आतां श्रवण कैसें करावें | तेंही सांगिजेल स्वभावें |
श्रोतीं अवधान द्यावें | एकचित्तें ||१||
एक वक्तृत्व श्रवणीं पडे | तेणें झालें समाधान मोडे |
केला निश्चयो विघडे | अकस्मात ||२||
तें वक्तृत्व त्यागावें | जें मायिक स्वभावें |
तेथें निश्चयाच्या नांवें | शून्याकार ||३||
एक्या ग्रंथें निश्चयो केला | तो दुजयानें उडविला |
तेणें संशयचि वाढला | जन्मवरी ||४||
जेथें संशय तुटती | होय आशंकानिवृत्ती |
अद्वैतग्रंथ परमार्थीं | श्रवण करावे ||५||
जो मोक्षाचा अधिकारी | तो परमार्थपंथ धरी |
प्रीति लागली अंतरीं | अद्वैतग्रंथाची ||६||
जेणें सांडिला इहलोक | जो परलोकींचा साधक |
तेणें पाहावा विवेक | अद्वैतशास्त्रीं ||७||
जयास पाहिजे अद्वैत | तयापुढें ठेवितां द्वैत |
तेणें क्षोभलें उठे चित्त | तया श्रोतयांचें ||८||
आवडीसारिखें मिळे | तेणें सुखचि उचंबळे |
नाहीं तरी कंटाळे | मानस ऐकतां ||९||
ज्याची उपासना जैसी | त्यासि प्रीति वाढे तैसी |
तेथें वर्णितां दुजयासी | प्रशस्त न वाटे ||१०||
प्रीतीचें लक्षण ऐसें | अंतरीं उठे अनायासें |
पाणी पाणवाटें जैसें | आपणचि धांवे ||११||
तैसा जो आत्मज्ञानी नर | तयास नावडे इतर |
तेथें पाहिजे सारासार- . विचारणा ते ||१२||
जेथें कुळदेवी भगवती | तेथें पाहिजे सप्तशती |
इतर देवांची स्तुती | कामा न ये सर्वथा ||१३||
घेतां अनंताच्या व्रता | तेथें नलगे भगवद्गीता |
साधुजनांसि वार्ता | फळाशेचि नाहीं ||१४||
वीरकंकण घालितां नाकीं | परी तें शोभा पावेना कीं |
जेथील तेथें आणिकीं | कामा न ये सर्वथा ||१५||
नाना माहात्म्यें बोलिलीं | जेथील तेथें वंद्य झालीं |
विपरीत करून वाचिलीं | तरी तें विलक्षण ||१६||
मल्हारीमाहात्म्य द्वारकेसी | द्वारकामाहात्म्य नेलें काशीसी |
काशीमाहात्म्य व्यंकटेशीं | शोभा न पावे ||१७||
ऐसें सांगतां असे वाड | परी जेथील तेथेंचि गोड |
तैसी ज्ञानियांस चाड | अद्वैतग्रंथाची ||१८||
योगियांपुढे राहाण | परीक्षावंतापुढें पाषाण |
पंडितापुढें डफगाण | शोभा न पावे ||१९||
वेदज्ञापुढें जती | निस्पृहापुढें फळश्रुति |
ज्ञानियापुढें पोथी | कोकशास्त्राच्ची ||२०||
ब्रह्मचर्यापुढें नाचणी | रासक्रीडा निरूपणीं |
राजहंसापुढें पाणी | ठेविलें जैसें ||२१||
तैसें अंतर्निष्ठापुढें | ठेविलें शृंगारी टीपडें |
तेणें त्याचें कैसें घडे | समाधान | २२||
रायास रंकाची आशा | तक्र सांगणें पीयूषा |
संन्याशास वोवसा | उच्छिष्टचांडाळीचा ||२३||
कर्मनिष्ठा वशीकरण | पंचाक्षरीया निरूपण |
तेथें भंगे अंतःकरण | सहजचि त्याचें ||२४||
तैसे पारमार्थिक जन | तयांस नसतां आत्मज्ञान |
ग्रंथ वाचितां समाधान | होणार नाहीं ||२५||
आतां असो हें बोलणें | जयास स्वहित करणें |
तेणें सदा विवरणें | अद्वैतग्रंथीं ||२६||
आत्मज्ञानी एकचित्त | तेणें पाहणें अद्वैत |
एकांत स्थळीं निवांत | समाधान ||२७||
बहुत प्रकारें पाहतां | ग्रंथ नाहीं अद्वैतापरता |
परमार्थास तत्वतां | तारूंच कीं ||२८||
इतर जे प्रापंचिक | हास्य विनोद नवरसिक |
हित नव्हे तें पुस्तक | परमार्थासी ||२९||
जेणें परमार्थ वाढे | अंगीं अनुताप चढे |
भक्तिसाधन आवडे | त्या नांव ग्रंथ ||३०||
जो ऐकतांच गर्व गळे | कां ते भ्रांतीच मावळे |
नातरी एकसरी वोळे | मन भगवंतीं ||३१||
जेणें होय उपरती | अवगुण अवघे पालटती |
जेणें चुके अधोगती | त्या नांव ग्रंथ ||३२||
जेणें धारिष्ट चढे | जेणें परोपकार घडे |
जेणें विषयवासना मोडे | त्या नांव ग्रंथ ||३३||
जेणें ग्रंथ परत्र साधन | जेणें ग्रंथें होय ज्ञान |
जेणें होइजे पावन | त्या नांव ग्रंथ ||३४||
ग्रंथ बहुत असती | नाना विधानें फळश्रुती |
जेथें नुपजे विरक्ती भक्ति | तो ग्रंथचि नव्हे ||३५||
मोक्षेंविण फळश्रुती | ते दुराशेची पोथी |
ऐकतां ऐकतां पुढती | दुराशाच वाढे ||३६||
श्रवणीं लोभ उपजेल जेथें | विवेक कैंचा असेल तेथें |
बैसलीं दुराशेचीं भूतें | तयां अधोगती ||३७||
ऐकोनीच फळश्रुती | पुढें तरी पावों म्हणती |
तयां जन्म अधोगती | सहजचि जाहली ||३८||
नाना फळें पक्षी खाती | तेणेंचि तयां होय तृप्ती |
परी त्या चकोराचे चित्तीं | अमृत वसे ||३९||
तैसें संसारी मनुष्य | पाहे संसाराची वास |
परी जे भगवंताचे अंश | ते भगवंत इच्छिती ||४०||
ज्ञानियास पाहिजे ज्ञन | भजकास पाहिजे भजन |
साधकास पाहिजे साधन | इच्छेसारिखें ||४१||
परमार्थ्यास पाहिजे परमार्थ | स्वार्थ्यास पाहिजे स्वार्थ |
कृपणास पाहिजे अर्थ | मनापासूनी ||४२||
योगियास पाहिजे योग | भोगियास पाहिजे भोग |
रोगियास पाहिजे रोग- . हरती मात्रा ||४३||
कवीस पाहिजे प्रबंध | तार्किकास पाहिजे तर्कवाद |
भाविकास संवाद | गोड वाटे ||४४||
पंडितास पाहिजे व्युत्पत्ती | विद्वानास अध्ययनप्रीती |
कलावंतास आवडती | नाना कळा ||४५||
हरिदासांस आवडे कीर्तन | शुचिर्भूतांस संध्यास्नान |
कर्मनिष्ठांस विधिविधान | पाहिजे तें ||४६||
प्रेमळास पाहिजे करुणा | दक्षता पाहिजे विचक्षणा |
चातुर्य पाहे शहाणा | आदरेंसीं ||४७||
भक्त पाहे मूर्तिध्यान | संगीत पाहे तालज्ञान |
रागज्ञानी तानमान | मूर्च्छना पाहे ||४८||
योगाभ्यासी पिंडज्ञान | तत्त्वज्ञानी तत्त्वज्ञान |
नाडीज्ञानी मात्राज्ञान | पाहतसे ||४९||
कामिक पाहे कोकशास्त्र | चेटकी पाहे चेटकीमंत्र |
यंत्री पाहे नाना यंत्र | आदरेंसी ||५०||
टवाळासि आवडे विनोद | उन्मतास नाना छंद |
तामसास प्रमाद | गोड वाटे ||५१||
मूर्ख होय नादलुब्धी | निंदक पाहे उणी संधी |
पापी पाहे पापबुद्धी | लावून अंगीं ||५२||
एकां पाहिजे रसाळ | एकां पाहिजे पाल्हाळ |
एकां पाहिजे केवळ | साबडी भक्ती ||५३||
आगमी पाहे आगम | शूर पाहे संग्राम |
एक पाहती नाना धर्म | इच्छेसारिखे ||५४||
मुक्त पाहे मुक्तलीला | सर्वज्ञ पाहे सर्वज्ञकळा |
ज्योतिषी भविष्य पिंगळा | वर्णूं पाहे ||५५||
ऐसें सांगावें तें किती | आवडीसारिखें ऐकती |
नाना पुस्तकें वाचिती | सर्वकाळ ||५६||
परी परत्रसाधनेंविण | म्हणों नये तें श्रवण |
जेथें नाहीं आत्मज्ञान | तया नांव करमणूक ||५७||
गोडीविण गोडपण | नाकेंविण सुलक्षण |
ज्ञानेंविण निरूपण | बोलोंचि नये ||५८||
आतां असो हें बहुत | ऐकावा परमार्थ ग्रंथ |
परमार्थग्रंथेंविण व्यर्थ | गाथागोवी ||५९||
म्हणोनि नित्यानित्यविचार | जेथें बोलिला सारासार |
तोचि ग्रंथ पैलपार | पाववी विवेकें ||६०||
हरि ॐ तत्सत् इति श्रीदासबोधे गुरुशिष्यसंवादे
सप्तमदशके श्रवणनिरूपणं नाम नवमः समासः ||९||७. ९
समास दहावा : देहान्तनिरूपण
श्रीराम ||
मिथ्या तेंचि झालें सत्य | सत्य तेंचि झालें असत्य |
मायाविभ्रमाचें कृत्य | ऐसें असे पाहतां ||१||
सत्य कळावयाकारणें | बोलिलीं नाना निरूपणें |
तरी उठेना धरणें | असत्याचें ||२||
असत्य अंतरीं बिंबलें | न सांगतां तें दृढ झालें |
सत्य असोन हरपलें | जेथील तेथें ||३||
वेद शास्त्रें पुराणें सांगती | सत्याचा निश्चयो करिती |
तरि न ये आत्मप्रचीती | सत्य स्वरूप ||४||
सत्य असोन आच्छादलें | मिथ्या असोन सत्य झालें |
ऐसें विपरीत वर्तलें | देखतदेखतां ||५||
ऐसी मायेची करणी | कळों आली तत्क्षणीं |
संतसंगें निरूपणीं | विचार घेतां ||६||
मागां झालें निरूपण | देखिलें आपणासि आपण |
तेणें बाणली खूण | परमार्थाची ||७||
तेणें समाधान झालें | चित्त चैतन्यीं मिळालें |
निजस्वरूपें ओळखिलें | निजवस्तूसी ||८||
प्रारब्धें टाकिला देहो | बोधें फिटला संदेहो |
आतांचि पडो अथवा राहो | मिथ्या कलेवर ||९||
ज्ञानियांचें जें शरीर | तें मिथ्यत्वें निर्विकार |
जेथें पडे तेचि सार | पुण्यभूमी ||१०||
साधुदर्शनें पावन तीर्थ | पुरती त्यांचे मनोरथ |
साधू न येतां जिणें व्यर्थ | तया पुण्यक्षेत्रांचें ||११||
पुण्यनदीचें जें तीर | तेथें पडावें हें शरीर |
हा इतर जनांचा विचार | साधु तोंचि नित्यमुक्त ||१२||
उत्तरायण तें उत्तम | दक्षिणायन तें अधम |
हा संदेहीं वसे भ्रम | साधु तो निःसंदेही ||१३||
शुक्लपक्ष उत्तरायण | गृहीं दीप दिवामरण |
अंतीं रहावें स्मरण | गतीकारणें ||१४||
इतुकें नलगे योगियासी | तो जितचि मुक्त पुण्यराशी |
तिलांजली पापपुण्यासी | दिधली तेणें ||१५||
देहाचा अंत बरा झाला | देह सुखरूप गेला |
त्यास म्हणती धन्य झाला | अज्ञान जन ||१६||
जनांचें विपरीत मत | अंतीं भेटतो भगवंत |
ऐसें कल्पून घात | करिती आपुला स्वयें ||१७||
जितां सार्थक नाहीं केलें | व्यर्थ आयुष्य निघोन गेलें |
मुळीं धान्यचि नाहीं पेरिलें | तें उगवेल कैंचें ||१८||
जरी केलें ईश्वरभजन | तरी तो होइजे पावन |
जैसें वेव्हारितां धन | राशी माथां लाभे ||१९||
दिधल्याविण पाविजेना | पेरिल्याविण उगवेना |
ऐसें हें वाक्य जनां | ठाउकेंचि आहे ||२०||
न करितां सेवेच्या व्यापारा | स्वामीस म्हणे कोठें मुशारा |
तैसें अंतीं अभक्त नरा | स्वहित न घडे ||२१||
जितां नाहीं भगवद्भक्ती | मेल्या कैंची होईल मुक्ती |
असो जे जे ऐसें करिती | ते ते पावती तैसेंचि ||२२||
एवं न करितां भगवद्भजन | अंतीं न होइजे पावन |
जरी आलें बरवें मरण | तरी भक्तिविण अधोगती ||२३||
म्हणोन साअधूनें आपुलें | जीत असतांच सार्थक केलें |
शरीर कारणीं लागलें | धन्य त्याचें ||२४||
जे कां जीवन्मुक्त ज्ञानी | त्यांचें शरीर पडो रानीं |
अथवा पडो स्मशानीं | तरी ते धन्य झाले ||२५||
साधूंचा देह खितपला | अथवा श्वानादिकीं भक्षिला |
हें प्रशस्त न वाटे जनांला | मंदबुद्धीस्तव ||२६||
अंत बरा नव्हेचि म्हणोन | कष्टी होती इतर जन |
परी ते बापुडे अज्ञान | नेणती वर्म ||२७||
जो जन्मलाचि नाहीं ठायींचा | त्यास मृत्यु येईल कैंचा |
विवेकबळें जन्ममृत्यूचा | घोट भरिला जेणें ||२८||
स्वरूपानुसंधानबळें | सगळीच माया नाडळे |
तयाचा पार न कळे | ब्रह्मादिकांसी ||२९||
तो जित असतांचि मेला | मरणास मारून जियाला |
जन्म मृत्यु न स्मरे त्याला | विवेकबळें ||३०||
तो जनीं दिसतो परी वेगळा | वर्ततां भासे निराळा |
दृश्य पदार्थ त्या निर्मळा | स्पर्शलाचि नाहीं ||३१||
असो ऐसे साधु जन | त्यांचें घडलिया भजन |
तेणें भजनें पावन | इतर जन होती ||३२||
सद्गुरूचा जो अंकित साधक | तेणें केलाच करावा विवेक |
विवेक केलिया तर्क | फुटे निरूपणीं ||३३||
हेंचि साधकासी निरवणें | अद्वैत प्रांजळ निरूपणें |
तुमचेंहि समाधान बाणे | साधूच ऐसें ||३४||
जो संतांसी शरण गेला | तो संतचि होऊन ठेला |
इतर जनां उपयोगा आला | कृपाळुपणें ||३५||
ऐसें संतांचें महिमान | संतसंगें होतें ज्ञान |
सत्संगापरतें साधन | आणिक नाहीं ||३६||
गुरुभजनाचेनि आधारें | निरूपणाचेनि विचारें |
क्रियाशुद्ध निर्धारें | पाविजे पद ||३७||
परमार्थाचें जन्मस्थान | तेंचि सद्गुरूचें भजन |
सद्गुरुभजनें समाधान | अकस्मात बाणे ||३८||
देह मिथ्या जाणोनि जीवें | याचें सार्थकचि करावें |
भजनभावें तोषवावें | चित्त सद्गुरूचें ||३९||
शरणागताची वाहे चिंता | तो एक सद्गुरु दाता |
जैसें बाळका वाढवी माता | नाना यत्नेंकरूनी ||४०||
यस्य देवे पराभक्तिर्यथा देवे तथा गुरौ ||
म्हणोनि सद्गुरूचें भजन | जयास घडे तोचि धन्य |
सद्गुरुवीण समाधान | आणिक नाहीं ||४१||
सरली शब्दाची खटपट | आला ग्रंथाचा शेवट |
येथें सांगितलें स्पष्ट | सद्गुरुभजन ||४२||
सद्गुरुभजनापरतें कांहीं | मोक्षदायक दुसरें नाहीं |
जयांस न मने तिहीं | अवलोकावी गुरुगीता ||४३||
तेथें निरूपिलें बरवें | पार्वतीप्रति सदाशिवें |
याकारणें सद्भावें | सद्गुरुचरण सेवावे ||४४||
जो ये ग्रंथींचा विवेक | विवंचून पाहे साधक |
तयास सांपडे एक | निश्चयो ज्ञानाचा ||४५||
ज्या ग्रंथीं बोलिलें अद्वैत | तो म्हणूं नये प्राकृत |
सत्य जाणावा वेदांत | अर्थाविषयीं ||४६||
प्राकृतें वेदांत कळे | सकळ शास्त्रीं पाहतां मिळे |
आणि समाधान निवळे | अंतर्यामीं ||४७||
तें प्राकृत म्हणों नये | जेथें ज्ञानाचा उपाय |
मूर्खासि हें कळे काय | मर्कटा नारिकेळ जैसें ||४८||
आतां असो हें बोलणें | अधिकारपरत्वें घेणें |
शिंपीमधील मुक्त उणें | म्हणों नये ||४९||
जेथें नेति नेति म्हणती श्रुती | तेथें न चले भाषाव्युत्पत्ती |
परब्रह्म आदि अंतीं | अनिर्वाच्य ||५०||
हरि ॐ तत्सत् इति श्रीदासबोधे गुरुशिष्यसंवादे
सप्तमदशके देहातीतनिरूपणं नाम दशमः समासः ||१०||७. १०
जय जय रघुवीर समर्थ ||
||दशक सातवा समाप्त ||
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% Text title : Dasabodh dAsabodha
% Author : Swami Samartha Ramadas
% Language : Marathi, Sanskrit
% Subject : philosophy/hinduism/religion
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