||समर्थ रामदासांचा दासबोध दशक ५ ||
||दशक पाचवा : मंत्रांचा ||५||
समास पहिला : गुरुनिश्चय
||श्रीराम ||
जय जज जी सद्गुरु पूर्णकामा| परमपुरुषा आत्मयारामा |
अनुर्वाच्य तुमचा महिमा| वर्णिला न वचे ||१||
जें वेदांस सांकडें| जें शब्दासि कानडें |
तें सत्शिष्यास रोकडें| अलभ्य लाभे ||२||
जें योगियांचें निजवर्म| जें शंकराचें निजधाम |
जें विश्रांतीचें निजविश्राम| परम गुह्य अगाध ||३||
तें ब्रह्म तुमचेनि योगें| स्वयें आपणचि होईजे आंगें |
दुर्घट संसाराचेनि पांगें| पांगिजेना सर्वथा ||४||
आतां स्वामिचेनि लडिवाळपणें| गुरुशिष्यांचीं लक्षणें |
सांगिजेती तेणें प्रमाणें - | मुमुक्षें शरण जावें ||५||
गुरु तों सकळांसी ब्राह्मण| जऱ्हीं तो जाला क्रियाहीन |
तरी तयासीच शरण| अनन्यभावें असावें ||६||
अहो या ब्राह्मणाकारणें| अवतार घेतला नारायेणें |
विष्णूनें श्रीवत्स मिरविणें| तेथें इतर ते किती ||७||
ब्राह्मणवचनें प्रमाण| होती शूद्रांचे ब्राह्मण |
धातुपाषाणीं देवपण| ब्राह्मणचेनि मंत्रें ||८||
मुंजीबंधनेंविरहित| तो शूद्रचि निभ्रांत |
द्विजन्मी म्हणोनि सतंत| द्विज ऐसें नाम त्याचें ||९||
सकळांसि पूज्य ब्राह्मण| हे मुख्य वेदाज्ञा प्रमाण |
वेदविरहित तें अप्रमाण| अप्रिये भगवंता ||१०||
ब्राह्मणीं योग याग व्रतें दानें| ब्राह्मणीं सकळ
तीर्थाटणें |
कर्ममार्ग ब्राह्मणाविणें| होणार नाहीं ||११||
ब्राह्मण वेद मूर्तिमंत| ब्राह्मण तोचि भगवंत |
पूर्ण होती मनोरथ| विप्रवाक्येंकरूनी ||१२||
ब्राह्मणपूजनें शुद्ध वृत्ती- | होऊन, जडे भगवंतीं |
ब्राह्मणतीर्थे उत्तम गती| पावती प्राणी ||१३||
लक्षभोजनीं पूज्य ब्राह्मण| आन यातिसि पुसे कोण |
परी भगवंतासि भाव प्रमाण| येरा चाड नाहीं ||१४||
असो ब्राह्मणा सुरवर वंदिती| तेथें मानव बापुडें किती |
जरी ब्राह्मण मूढमती| तरी तो जगद्वंद्य ||१५||
अंत्येज शब्दज्ञाता बरवा| परी तो नेऊन कायेए करावा |
ब्राह्मणासन्निध पुजावा| हें तों न घडे कीं ||१६||
जें जनावेगळें केलें| तें वेदें अव्हेरिलें |
म्हणोनि तयासि नाम ठेविलें| पाषांडमत ||१७||
असो जे हरिहरदास| तयास ब्राह्मणीं विस्वास |
ब्राह्मणभजनें बहुतांस| पावन केलें ||१८||
ब्राह्मणें पाविजे देवाधिदेवा| तरी किमर्थ सद्गुरु करावा |
ऐसें म्हणाल तरी निजठेवा| सद्गुरुविण नाहीं ||१९||
स्वधर्मकर्मीं पूज्य ब्राह्मण| परी ज्ञान नव्हे सद्गुरुविण |
ब्रह्मज्ञान नस्तां सीण| जन्ममृत्य चुकेना ||२०||
सद्गुरुविण ज्ञान कांहीं| सर्वथा होणार नाहीं |
अज्ञान प्राणी प्रवाहीं| वाहातचि गेले ||२१||
ज्ञानविरहित जें जें केलें| तें तें जन्मासि मूळ जालें |
म्हणौनि सद्गुरूचीं पाऊलें| सुधृढ धरावीं ||२२||
जयास वाटे देव पाहावा| तेणें सत्संग धरावा |
सत्संगेंविण देवाधिदेवा| पाविजेत नाहीं ||२३||
नाना साधनें बापुडीं| सद्गुरुविण करिती वेडीं |
गुरुकृपेविण कुडकुडीं| वेर्थचि होती ||२४||
कार्तिकस्नानें माघस्नानें| व्रतें उद्यापनें दानें |
गोरांजनें धूम्रपानें| साधिती पंचाग्नी ||२५||
हरिकथा पुराणश्रवण| आदरें करिती निरूपण |
सर्व तीर्थें परम कठिण| फिरती प्राणी ||२६||
झळफळित देवतार्चनें| स्नानें संध्या दर्भासनें |
टिळे माळा गोपीचंदनें| ठसे श्रीमुद्रांचे ||२७||
अर्घ्यपात्रें संपुष्ट गोकर्णें| मंत्रयंत्रांचीं
तांब्रपर्णें |
नाना प्रकारीचीं उपकर्णें| साहित्यशोभा ||२८||
घंटा घणघणा वाजती| स्तोत्रें स्तवनें आणी स्तुती |
आसनें मुद्रा ध्यानें करिती| प्रदक्ष्णा नमस्कार ||२९||
पंचायेत्न पूजा केली| मृत्तिकेचीं लिंगें लाखोली |
बेलें नारिकेळें भरिली| संपूर्ण सांग पूजा ||३०||
उपोषणें निष्ठा नेम| परम सायासीं केलें कर्म |
फळचि पावती, वर्म- | चुकले प्राणी ||३१||
येज्ञादिकें कर्में केलीं| हृदईं फळाशा कल्पिली |
आपले इछेनें घेतली| सूति जन्मांची ||३२||
करूनि नाना सायास| केला चौदा विद्यांचा अभ्यास |
रिद्धि सिद्धि सावकास| वोळल्या जरी ||३३||
तरी सद्गुरुकृपेविरहित| सर्वथा न घडे स्वहित |
येमेपुरीचा अनर्थ| चुकेना येणें ||३४||
जंव नाहीं ज्ञानप्राप्ती| तंव चुकेना यातायाती |
गुरुकृपेविण अधोगती| गर्भवास चुकेना ||३५||
ध्यान धारणा मुद्रा आसन| भक्ती भाव आणी भजन |
सकळहि फोल ब्रह्मज्ञान - | जंव तें प्राप्त नाहीं ||३६||
सद्गुरुकृपा न जोडे| आणी भलतीचकडे वावडे |
जैसें आंधळें चाचरोन पडे| गारीं आणी गडधरां ||३७||
जैसें नेत्रीं घालितां अंजन| पडे दृष्टीस निधान |
तैसें सद्गुरुवचनें ज्ञान- | प्रकाश होये ||३८||
सद्गुरुविण जन्म निर्फळ| सद्गुरुविण दुःख सकळ |
सद्गुरुविण तळमळ| जाणार नाहीं ||३९||
सद्गुरुचेनि अभयंकरें| प्रगट होईजे ईश्वरें |
संसारदुःखें अपारें| नासोन जाती ||४०||
मागें जाले थोर थोर| संत महंत मुनेश्वर |
तयांसहि ज्ञानविज्ञानविचार| सद्गुरुचेनी ||४१||
श्रीरामकृष्ण आदिकरूनी| अतितत्पर गुरुभजनीं |
सिद्ध साधु आणी संतजनीं| गुरुदास्य केलें ||४२||
सकळ सृष्टीचे चाळक| हरिहरब्रह्मादिक |
तेहि सद्गुपदीं रंक| महत्वा न चढेती ||४३||
असो जयासि मोक्ष व्हावा| तेणें सद्गुरु करावा |
सद्गुरुविण मोक्ष पावावा| हें कल्पांतीं न घडे ||४४||
आतां सद्गुरु ते कैसे| नव्हेति इतरां गुरु ऐसे |
जयांचे कृपेनें प्रकाशे| शुद्ध ज्ञान ||४५||
त्या सद्गुरूची वोळखण| पुढिले समासीं निरूपण |
बोलिलें असे श्रोतीं श्रवण| अनुक्रमें करावें ||४६||
इति श्रीदासबोधे गुरुशिष्यसंवादे गुरुनिश्चयेनाम
समास पहिला ||१||५. १
समास दुसरा : गुरुलक्षण
||श्रीराम ||
जे करामती दाखविती| तेहि गुरु म्हणिजेती |
परंतु सद्गुरु नव्हेती| मोक्षदाते ||१||
सभामोहन भुररीं चेटकें| साबरमंत्र कौटालें अनेकें |
नाना चमत्कार कौतुकें| असंभाव्य सांगती ||२||
सांगती औषधीप्रयोग| कां सुवर्णधातूचा मार्ग |
दृष्टिबंधनें लागवेग| अभिळाषाचा ||३||
साहित संगीत रागज्ञान| गीत नृत्य तान मान |
नाना वाद्यें सिकविती जन| तेहि येक गुरु ||४||
विद्या सिकविती पंचाक्षरी| ताडेतोडे नानापरी |
कां पोट भरे जयावरी| ते विद्या सिकविती ||५||
जो यातीचा जो व्यापार| सिकविती भरावया उदर |
तेहि गुरु परी साचार- | सद्गुरु नव्हेती ||६||
आपली माता आणी पिता| तेहि गुरुचि तत्वतां |
परी पैलापार पावविता| तो सद्गुरु वेगळा ||७||
गाईत्रीमंत्राचा इचारू| सांगे तो साचार कुळगुरु |
परी ज्ञानेंविण पैलपारु| पाविजेत नाहीं ||८||
जो ब्रह्मज्ञान उपदेसी| अज्ञानांधारें निरसी |
जीवात्मयां परमात्मयांसी| ऐक्यता करी ||९||
विघडले देव आणी भक्त| जीवशिवपणें द्वैत |
तया देवभक्तां येकांत- | करी, तो सद्गुरु ||१०||
भवव्याघ्रें घालूनि उडी| गोवत्सास तडातोडी |
केली, देखोनि सीघ्र सोडी| तो सद्गुरु जाणावा ||११||
प्राणी मायाजाळीं पडिलें| संसारदुःखें दुःखवलें |
ऐसें जेणें मुक्त केलें| तो सद्गुरु जाणावा ||१२||
वासनानदीमाहांपुरीं| प्राणी बुडतां ग्लांती करी |
तेथें उडी घालूनि तारी| तो सद्गुरु जाणावा ||१३||
गर्भवास अति सांकडी| इछाबंधनाची बेडी |
ज्ञान देऊन सीघ्र सोडी| तो सद्गुरु स्वामी ||१४||
फोडूनि शब्दाचें अंतर| वस्तु दाखवी निजसार |
तोचि गुरु माहेर| अनाथांचें ||१५||
जीव येकदेसी बापुडें| तयास ब्रह्मचि करी रोकडें |
फेडी संसारसांकडे| वचनमात्रें ||१६||
जें वेदांचे अभ्यांतरीं| तें काढून अपत्यापरी |
शिष्यश्रवणीं कवळ भरी| उद्गारवचनें ||१७||
वेद शास्त्र माहानुभाव| पाहातां येकचि अनुभव |
तोचि येक गुरुराव| ऐक्यरूपें ||१८||
संदेह निःशेष जाळी ||स्वधर्म आदरें प्रतिपाळी |
वेदविरहित टवाळी| करूंच नेणे ||१९||
जें जें मन अंगिकारी| तें तें स्वयें मुक्त करी |
तो गुरु नव्हे, भिकारी- | झडे आला ||२०||
शिष्यास न लविती साधन| न करविती इंद्रियेंदमन |
ऐसे गुरु आडक्याचे तीन| मिळाले तरी त्यजावे ||२१||
जो कोणी ज्ञान बोधी| समूळ अविद्या छेदी |
इंद्रियेंदमन प्रतिपादी| तो सद्गुरु जाणावा ||२२||
येक द्रव्याचे विकिले| येक शिष्याचे आखिले |
अतिदुराशेनें केले| दीनरूप ||२३||
जें जें रुचे शिष्यामनीं| तैसीच करी मनधरणी |
ऐसी कामना पापिणी| पडली गळां| २४||
जो गुरु भीडसारु| तो अद्धमाहून अद्धम थोरु |
चोरटा मंद पामरु| द्रव्यभोंदु ||२५||
जैसा वैद्य दुराचारी| केली सर्वस्वें बोहरी |
आणी सेखीं भीड करी| घातघेणा ||२६||
तैसा गुरु नसावा| जेणें अंतर पडे देवा |
भीड करूनियां, गोवा- | घाली बंधनाचा ||२७||
जेथें शुद्ध ब्रह्मज्ञान| आणी स्थूळ क्रियेचें साधन |
तोचि सद्गुरु निधान| दाखवी डोळां ||२८||
देखणें दाखविती आदरें| मंत्र फुंकिती कर्णद्वारें |
इतुकेंच ज्ञान, तें पामरें- | अंतरलीं भगवंता ||२९||
बाणे तिहींची खूण| तोचि गुरु सुलक्षण |
तेथेंचि रिघावें शरण| अत्यादरें मुमुक्षें ||३०||
अद्वैतनिरूपणीं अगाध वक्ता| परी विषईं लोलंगता |
ऐसिया गुरूचेनि सार्थकता| होणार नाहीं ||३१||
जैसा निरूपणसमयो| तैसेंचि मनहि करी वायो |
कृतबुद्धीचा जयो| जालाच नाहीं ||३२||
निरूपणीं सामर्थ्य सिद्धी| श्रवण होतां दुराशा बाधी |
नाना चमत्कारें बुद्धी| दंडळूं लागे ||३३||
पूर्वीं ज्ञाते विरक्त भक्त| तयांसि सादृश्य भगवंत |
आणी सामर्थ्यहि अद्भुत| सिद्धीचेनि योगें ||३४||
ऐसें तयांचें सामर्थ्य| आमुचें ज्ञानचि नुसदें वेर्थ |
ऐसा सामर्थ्याचा स्वार्थ| अंतरीं वसे ||३५||
निशेष दुराशा तुटे| तरीच भगवंत भेटे |
दुराशा धरिती ते वोखटे| शब्दज्ञाते कामिक ||३६||
बहुत ज्ञातीं नागवलीं| कामनेनें वेडीं केलीं |
कामना इच्छितांच मेलीं| बापुडीं मूर्खें ||३७||
निशेष कामनारहित| ऐसा तो विरुळा संत |
अवघ्यांवेगळें मत| अक्षै ज्याचें ||३८||
अक्षै ठेवा सकळांचा| परी पांगडा फिटेना शरीराचा |
तेणें मार्ग ईश्वराचा| चुकोनि जाती ||३९||
सिद्धि आणी सामर्थ्य जालें| सामर्थ्यें देहास महत्त्व आलें |
तेणें वेंचाड वळकावलें| देहबुद्धीचें ||४०||
सांडूनि अक्षै सुख| सामर्थ्य इछिती ते मूर्ख |
कामनेसारिखें दुःख| आणीक कांहींच नाहीं ||४१||
ईश्वरेंविण जे कामना| तेणेएंचि गुणें नाना यातना |
पावती, होती पतना- | वरपडे प्राणी ||४२||
होतां शरीरासी अंत| सामर्थ्यहि निघोन जात |
सेखीं अंतरला भगवंत| कामनागुणें ||४३||
म्हणोनि निःकामताविचारु| दृढबुद्धीचा निर्धारु |
तोचि सद्गुरु पैलपारु| पाववी भवाचा ||४४||
मुख्य सद्गुरूचें लक्षण| आधीं पाहिजे विमळ ज्ञान |
निश्चयाचें समाधान| स्वरूपस्थिती ||४५||
याहीवरी वैराग्य प्रबळ| वृत्ति उदास केवळ |
विशेष आचारें निर्मळ| स्वधर्मविषईं ||४६||
याहिवरी अध्यात्मश्रवण| हरिकथा निरूपण |
जेथें परमार्थविवरण| निरंतर ||४७||
जेथें सारासारविचार| तेथें होये जगोद्धार |
नवविधा भक्तीचा आधार| बहुता जनासी ||४८||
म्हणोनि नवविधा भजन| जेथें प्रतिष्ठलें साधन |
हें सद्गुरूचें लक्षण| श्रोतीं वोळखावें ||४९||
अंतरीं शुद्ध ब्रह्मज्ञान| बाह्य निष्ठेचें भजन |
तेथें बहु भक्त जन| विश्रांति पावती ||५०||
नाहीं उपासनेचा आधार| तो परमार्थ निराधार |
कर्मेंविण अनाचार| भ्रष्ट होती ||५१||
म्हणोनि ज्ञान वैराग्य आणि भजन| स्वधर्मकर्म आणि साधन |
कथा निरूपण श्रवण मनन| नीति न्याये मर्यादा ||५२||
यामधें येक उणें असे| तेणें तें विलक्षण दिसे |
म्हणौन सर्वहि विलसे| सद्गुरुपासीं ||५३||
तो बहुतांचें पाळणकर्ता| त्यास बहुतांची असे चिंता |
नाना साधनें समर्था| सद्गुरुपासीं ||५४||
साधनेंविण परमार्थ प्रतिष्ठे| तो मागुतां सवेंच भ्रष्टे |
याकारणे दुरीद्रष्टे| माहानुभाव ||५५||
आचार उपासना सोडिती| ते भ्रष्ट अभक्त दिसती |
जळो तयांची महंती| कोण पुसे ||५६||
कर्म उपासनेचा अभाव| तेथें भकाधेसि जाला ठाव |
तो कानकोंडा समुदाव| प्रपंची हांसती ||५७||
नीच यातीचा गुरु| तोही कानकोंड विचारु |
ब्रह्मसभेस जैसा चोरू| तैसा दडे ||५८||
ब्रह्मसभे देखतां| त्याचें तीर्थ नये घेतां |
अथवा प्रसाद सेवितां| प्राश्चित पडे ||५९||
तीर्थप्रसादाची सांडी केली| तेथें नीचता दिसोन आली |
गुरुभक्ति ते सटवली| येकायेकी ||६०||
गुरुची मर्यादा राखतां| ब्राह्मण क्षोभती तत्वतां |
तेथें ब्राह्मण्य रक्षूं जातां| गुरुक्षोभ घडे ||६१||
ऐसीं सांकडीं दोहींकडे| तेथें प्रस्तावा घडे |
नीच यातीस गुरुत्व न घडे| याकारणें ||६२||
तथापि आवडी घेतली जीवें| तरी आपणचि भ्रष्टावें |
बहुत जनांसी भ्रष्टवावें| हें तों दूषणचि कीं ||६३||
आतां असो हा विचारू| स्वयातीचा पाहिजे गुरु |
नाहीं तरी भ्रष्टाकारु| नेमस्त घडे ||६४||
जे जे कांहीं उत्तम गुण ||तें तें सद्गुरूचें लक्षण |
तथापि संगों वोळखण| होये जेणें ||६५||
येक गुरु येक मंत्रगुरु| येक यंत्रगुरु येक तांत्रगुरु |
येक वस्तादगुरु येक राजगुरु| म्हणती जनीं ||६६||
येक कुळगुरु येक मानिला गुरु| येक विद्यागुरु येक कुविद्यागुरु |
येक असद्गुरु येक यातिगुरु| दंडकर्ते ||६७||
येक मातागुरु येक पितागुरु| येक राजागुरु येक देवगुरु |
येक बोलिजे जगद्गुरु| सकळकळा ||६८||
ऐसे हे सत्रा गुरु| याहिवेगळे आणीक गुरु |
ऐक तयांचा विचारु| सांगिजेल ||६९||
येक स्वप्नगुरु येक दीक्षागुरु| येक म्हणती प्रतिमागुरु |
येक म्हणती स्वयें गुरु| आपला आपण ||७०||
जे जे यातीचा जो व्यापारु| ते ते त्याचे तितुके गुरु |
याचा पाहातां विचारु| उदंड आहे ||७१||
असो ऐसे उदंड गुरु| नाना मतांचा विचारु |
परी जो मोक्षदाता सद्गुरु| तो वेगळाचि असे ||७२||
नाना सद्विद्येचे गुण| याहिवरी कृपाळूपण |
हें सद्गुरूचें लक्षण| जाणिजे श्रोतीं ||७३||
इति श्रीदासबोधे गुरुशिष्यसंवादे गुरुलक्षणनाम
समास दुसरा ||२||५. २
समास तिसरा : शिष्यलक्षण
||श्रीराम ||
माअगां सद्गुरूचें लक्षण| विशद केलें निरूपण |
आतां सच्छिष्याची वोळखण| सावध ऐका ||१||
सद्गुरुविण सच्छिष्य| तो वायां जाय निशेष |
कां सच्छिष्येंविण विशेष| सद्गुरु सिणे ||२||
उत्तमभूमि शोधिली शुद्ध| तेथें बीज पेरिलें किडखाद |
कां तें उत्तम बीज परी समंध| खडकेंसि पडिला ||३||
तैसा सच्छिष्य तें सत्पात्र| परंतु गुरु सांगे मंत्र तंत्र |
तेथें अरत्र ना परत्र| कांहिंच नाहीं ||४||
अथवा गुरु पूर्ण कृपा करी| परी शिष्य अनाधिकारी |
भाअग्यपुरुषाचा भिकारी| पुत्र जैसा ||५||
तैसें येकाविण येक| होत असे निरार्थक |
परलोकींचें सार्थक| तें दुऱ्हावे ||६||
म्हणौनि सद्गुरु आणी सच्छिष्य| तेथें न लगती सायास |
त्यां उभयतांचा हव्यास| पुरे येकसरा ||७||
सुभूमि आणी उत्तम कण| उगवेना प्रजन्येंविण |
तैसें अध्यात्मनिरूपण| नस्तां होये ||८||
सेत पेरिलें आणी उगवलें| परंतु निगेविण गेलें |
साधनेंविण तैसें जालें| साधकांसी ||९||
जंवरी पीक आपणास भोगे| तंवरी अवघेंचि करणें लागे |
पीक आलियांहि, उगें- | राहोंचि नये ||१०||
तैसें आत्मज्ञान जालें| परी साधन पाहिजे केलें |
येक वेळ उदंड जेविलें| तऱ्हीं सामग्री पाहिजे ||११||
म्हणौन साधन अभ्यास आणी सद्गुगु| सच्छिष्य आणी
सच्छास्त्रविचारु |
सत्कर्म सद्वासना, पारु- | पाववी भवाचा ||१२||
सदुपासना सत्कर्म| सत्क्रिया आणी स्वधर्म |
सत्संग आणी नित्य नेम| निरंतर ||१३||
ऐसें हें अवघेंचि मिळे| तरीच विमळ ज्ञान निवळे |
नाहीं तरी पाषांड संचरे बळें| समुदाईं ||१४||
येथें शब्द नाहीं शिष्यासी| हें अवघें सद्गुरुपासीं |
सद्गुरु पालटी अवगुणासी| नाना येत्नें करूनी ||१५||
सद्गुरुचेनि असच्छिष्य पालटे| परंतु सच्छिष्यें
असद्गुरु न पालटे |
कां जें थोरपण तुटे| म्हणौनिया ||१६||
याकरणें सद्गुरु पाहिजे| तरीच सन्मार्ग लाहिजे |
नाहिं तरी होईजे| पाषांडा वरपडे ||१७||
येथें सद्गुरुचि कारण| येर सर्व निःकारण |
तथापि सांगो वोळखण| सच्छिष्याची ||१८||
मुख्य सच्छिष्याचें लक्षण| सद्गुरुवचनीं विश्वास पूर्ण |
अनन्यभावें शरण| त्या नांव सच्छिष्य ||१९||
शिष्य पाहिजे निर्मळ| शिष्य पाहिजे आचारसीळ |
शिष्य पाहिजे केवळ| विरक्त अनुतापी ||२०||
शिष्य पाहिजे निष्ठावंत| शिष्य पाहिजे सुचिष्मंत |
शिष्य पाहिजे नेमस्त| सर्वप्रकारीं ||२१||
शिष्य पाहिजे साक्षपी विशेष| शिष्य पाहिजे परम दक्ष |
शिष्य पाहिजे अलक्ष| लक्षी ऐसा ||२२||
शिष्य पाहिजे अति धीर| शिष्य पाहिजे अति उदार |
शिष्य पाहिजे अति तत्पर| परमार्थविषईं ||२३||
शिष्य पाहिजे परोपकारी| शिष्य पाहिजे निर्मत्सरी |
शिष्य पाहिजे अर्थांतरीं| प्रवेशकर्ता ||२४||
शिष्य पाहिजे परम शुद्ध| शिष्य पाहिजे परम सावध |
शिष्य पाहिजे अगाध| उत्तम गुणांचा ||२५||
शिष्य पाहिजे प्रज्ञावंत| शिष्य पाहिजे प्रेमळ भक्त |
शिष्य पाहिजे नीतिवंत| मर्यादेचा ||२६||
शिष्य पाहिजे युक्तिवंत| शिष्य पाहिजे बुद्धिवंत |
शिष्य पाहिजे संतासंत| विचार घेता ||२७||
शिष्य पाहिजे धारिष्टाचा| शिष्य पाहिजे दृढ व्रताचा |
शिष्य पाहिजे उत्तम कुळीचा| पुण्यसीळ ||२८||
शिष्य असावा सात्विक| शिष्य असावा भजक |
शिष्य असावा साधक| साधनकर्ता ||२९||
शिष्य असावा विश्वासी| शिष्य असावा कायाक्लेशी |
शिष्य असावा परमार्थासी| वाढऊं जाणे ||३०||
शिष्य असावा स्वतंत्र| शिष्य असावा जगमित्र |
शिष्य असावा सत्पात्र| सर्व गुणें ||३१||
शिष्य असावा सद्विद्येचा| शिष्य असावा सद्भावाचा |
शिष्य असावा अंतरींचा| परमशुद्ध ||३२||
शिष्य नसावा अविवेकी| शिष्य नसावा गर्भसुखी |
शिष्य असावा संसारदुःखी| संतप्त देही ||३३||
जो संसारदुःखें दुःखवला| जो त्रिविधतापें पोळला |
तोचि अधिकारी जाला| परमार्थविषीं ||३४||
बहु दुःख भोगिलें जेणें| तयासीच परमार्थ बाणे |
संसारदुःखाचेनि गुणें| वैराग्य उपजे ||३५||
जया संसाराचा त्रास| तयासीच उपजे विस्वास |
विस्वासबळें दृढ कास| धरिली सद्गुरूची ||३६||
अविस्वासें कास सोडिली| ऐसीं बहुतेक भवीं बुडालीं |
नाना जळचरीं तोडिलीं| मध्येंचि सुखदुःखें ||३७||
याकारणें दृढ विस्वास| तोचि जाणावा सच्छिष्य |
मोक्षाधिकारी विशेष| आग्रगण्यु ||३८||
जो सद्गुरुवचनें निवाला| तो सयोज्यतेचा आंखिला |
सांसारसंगे पांगिला| न वचे कदा ||३९||
सद्गुरुहून देव मोठा| जयास वाटे तो करंटा |
सुटला वैभवाचा फांटा| सामरथ्यपिसें ||४०||
सद्गुरुस्वरूप तें संत| आणी देवांस मांडेल कल्पांत |
तेथें कैचें उरेल सामर्थ्य| हरिहरांचें ||४१||
म्हणौन सद्गुरुसामर्थ्य आधीक| जेथें आटती ब्रह्मादिक |
अल्पबुद्धी मानवी रंक| तयांसि हें कळेना ||४२||
गुरुदेवांस बराबरी- | करी तो शिष्य दुराचारी |
भ्रांति बैसली अभ्यांतरीं| सिद्धांत नेणवे ||४३||
देव मनिषीं भाविला| मंत्रीं देवपणासि आला |
सद्गुरु न वचे कल्पिला| ईश्वराचेनि ||४४||
म्हणौनि सद्गुरु पूर्णपणें| देवाहून आधीक कोटिगुणें |
जयासि वर्णितां भांडणें| वेदशास्त्रीं लागलीं ||४५||
असो सद्गुरुपदापुढें| दुजें कांहींच न चढे |
देवसामर्थ्य तें केवढें| मायाजनित ||४६||
अहो सद्गुरुकृपा जयासी| सामर्थ्य न चले तयापासीं |
ज्ञानबळें वैभवासी| तृणतुछ केलें || ४७||
अहो सद्गुरुकृपेचेनि बळें| अपरोक्षज्ञानाचेनि उसाळें |
मायेसहित ब्रह्मांड सगळें| दृष्टीस न यें ||४८||
ऐसें सच्छिष्याचें वैभव| सद्गुरुवचनीं दृढ भाव |
तेणें गुणें देवराव| स्वयेंचि होती ||४९||
अंतरीं अनुतापें तापले| तेणें अंतर शुद्ध जालें |
पुढें सद्गुरुवचनें निवाले| सच्छिष्य ऐसे ||५०||
लागतां सद्गुरुवचनपंथें| जालें ब्रह्मांड पालथें |
तरी जयाच्या शुद्ध भावार्थें| पालट न धरिजे ||५१||
शरण सद्गुरूस गेले| सच्छिष्य ऐसे निवडले |
क्रियापालटें जाले| पावन ईश्वरीं ||५२||
ऐसा सद्भाव अंतरीं| तेचि मुक्तीचे वाटेकरी |
येर माईक वेषधारी| असच्छिष्य ||५३||
वाटे विषयांचे सुख| परमार्थ संपादणे लौकिक |
देखोवेखीं पढतमूर्ख| शरण गेले ||५४||
जाली विषईं वृत्ति अनावर| दृढ धरिला संसार |
परमार्थचर्चेचा विचार| मळिण झाला ||५५||
मोड घेतला परमार्थाचा| हव्यास धरिला प्रपंचाचा |
भार वाहिला कुटुंबाचा| काबाडी जाला ||५६||
मानिला प्रपंचीं आनंद| केला परमार्थी विनोद |
भ्रांत मूढ मतिमंद| लोधला कामीं ||५७||
सूकर पूजिलें विलेपनें| म्हैसा मर्दिला चंदनें |
तैसा विषई ब्रह्मज्ञानें| विवेकें बोधिला ||५८||
रासभ उकिरडां लोळे| तयासि परिमळसोहळे |
उलूक अंधारीं पळे| तया केवी हंसपंगती ||५९||
तैसा विषयदारींचा बराडी| घाली अधःपतनीं उडी |
तयास भगवंत आवडी| सत्संग कैंचा ||६०||
वर्ती करून दांताळीं| स्वानपुत्र हाडें चगळी |
तैसा विषई तळमळी| विषयसुखाकारणे ||६१||
तया स्वानमुखीं परमान्न| कीं मर्कटास सिंहासन |
तैसें विषयशक्तां ज्ञान| जिरेल कैंचें ||६२||
रासभें राखतां जन्म गेला| तो पंडितांमध्यें प्रतिष्ठला |
न वचे, तैसा आअशक्ताला| परमार्थ नाहीं ||६३||
मिळाला राजहंसांचा मेळा| तेथें आला डोंबकावळा |
लक्षून विष्ठेचा गोळा| हंस म्हणवी ||६४||
तैसे सज्जनाचे संगती| विषई सज्जन म्हणविती |
विषय आमेद्य चित्तीं| गोळा लक्षिला ||६५||
काखे घेऊनियां दारा| म्हणे मज संन्यासी करा |
तैसा विषई सैरावैरा| ज्ञान बडबडी ||६६||
असो ऐसे पढतमूर्ख| ते काय जाणती अद्वैतसुख |
नारकी प्राणी नर्क| भोगिती स्वैच्छा ||६७||
वैषेची करील सेवा| तो कैसा मंत्री म्हणावा |
तैसा विषयदास मानावा| भक्तराज केवी ||६८||
तैसे विषई बापुडे| त्यांस ज्ञान कोणीकडे |
वाचाळ शाब्दिक बडबडे| वरपडे जाले ||६९||
ऐसे शिष्य परम नष्ट| कनिष्ठांमधें कनिष्ठ |
हीन अविवेकी आणी दृष्ट| खळ खोटे दुर्जन ||७०||
ऐसे जे पापरूप| दीर्घदोषी वज्रलेप |
तयांस प्राश्चीत, अनुताप- | उद्भवतां ||७१||
तेंहि पुन्हां शरण जावें| सद्गुरूस संतोषवावें |
कृपादृष्टी जालियां व्हावें| पुन्हां शुद्ध ||७२||
स्वामीद्रोह जया घडे| तो यावश्चंद्र नरकीं पडे |
तयास उपावचि न घडे| स्वामी तुष्टल्यावांचुनी ||७३||
स्मशानवैराग्य आलें| म्हणोन लोटांगण घातलें |
तेणें गुणें उपतिष्ठले- | नाहीं ज्ञान| ७४||
भाव आणिला जायाचा| मंत्र घेतला गुरूचा |
शिष्य जाला दो दिसांचा| मंत्राकारणें ||७५||
ऐसे केले गुरु उदंड| शब्द सिकला पाषांड |
जाला तोंडाळ तर्मुंड| माहापाषांडी ||७६||
घडी येक रडे आणी पडे| घडी येक वैराग्य चढे |
घडी येक अहंभाव जडे| ज्ञातेपणाचा ||७७||
घडी येक विस्वास धरी| सवेंच घडि येक गुर्गुरी |
ऐसे नाना छंद करी| पिसाट जैसा ||७८||
काम क्रोध मद मत्सर| लोभ मोह नाना विकार |
अभिमान कापट्य तिरस्कार| हृदईं नांदती ||७९||
अहंकार आणी देहपांग| अनाचार आणी विषयसंग |
संसार प्रपंच उद्वेग| अंतरीं वसे ||८०||
दीर्घसूत्री कृतघ्न पापी| कुकर्मी कुतर्की विकल्पी |
अभक्त अभाव सीघ्रकोपी| निष्ठुर परघातक ||८१||
हृदयेंसुन्य आणी आळसी| अविवेकी आणि अविस्वासी |
अधीर अविचार, संदेहासी- | दृढ धर्ता ||८२||
आशा ममता तृष्णा कल्पना| कुबुद्धी दुर्वृत्ति दुर्वासना |
अल्पबुद्धि विषयकामना| हृदईं वसे ||८३||
ईषणा असूया तिरस्कारें| निंदेसि प्रवर्ते आदरें |
देहाभिमानें हुंबरे| जाणपणें ||८४||
क्षुधा तृष्णा आवरेना| निद्रा सहसा धरेना |
कुटुंबचिंता वोसरेना| भ्रांति पडिली ||८५||
शाब्दिक बोले उदंड वाचा| लेश नाहीं वैराग्याचा |
अनुताप धारिष्ट साधनाचा| मार्ग न धरी ||८६||
भक्ति विरक्ति ना शांती| सद्वृत्ति लीनता ना दांती |
कृपा दया ना तृप्ती| सुबुद्धि असेच ना ||८७||
कायाक्लेसीं शेरीरहीन| धर्मविषईं परम कृपण |
क्रिया पालटेना कठिण| हृदये जयाचें ||८८||
आर्जव नाहीं जनासी| जो अप्रिये सज्जनासी |
जयाचे जिवीं आहिर्णेसीं| परन्यून वसे ||८९||
सदा सर्वकाळ लटिका| बोले माईक लापणिका |
क्रिया विचार पाहतां, येका| वचनीं सत्य नाहीं ||९०||
परपीडेविषईं तत्पर| जैसे विंचु आणि विखार |
तैसा कुशब्दें जिव्हार| भेदी सकळांचें ||९१||
आपले झांकी अवगुण| पुढिलांस बोले कठिण |
मिथ्या गुणदोषेंविण| गुणदोष लावी ||९२||
स्वयें पापात्मा अंतरीं| पुढिलांचि कणव न करी |
जैसा हिंसक दुराचारी| परदुःखें शिणेना ||९३||
दुःख पराव्याचें नेणती| दुर्जन गांजिले चि गांजिती |
श्रम पावतां आनंदती| आपुले मनीं ||९४||
स्वदुःखें झुरे अंतरीं| आणी परदुःखें हास्य करी |
तयास प्राप्त येमपुरी| राजदूत ताडिती ||९५||
असो ऐसें मदांध बापुडें| तयांसि भगवंत कैंचा जोडे |
जयांस सुबुद्धि नावडे| पूर्वपातकेंकरूनी ||९६||
तयास देहाचा अंतीं| गात्रें क्षीणता पावती |
जिवलगें वोसंडिती| जाणवेल तेव्हां ||९७||
असो ऐसे गुणावेगळे| ते सच्छिष्य आगळे |
दृढभावार्थें सोहळे| भोगिती स्वानंदाचे ||९८||
जये स्थळीं विकल्प जागे| कुळाभिमान पाठीं लागे |
ते प्राणी प्रपंचसंगें| हिंपुटी होती ||९९||
जेणेंकरितां दुःख जालें| तेंचि मनीं दृढ धरिलें |
तेणें गुणें प्राप्त जालें| पुन्हां दुःख ||१००||
संसारसंगें सुख जालें| ऐसें देखिलें ना ऐकिलें |
ऐसें जाणोन अनहित केलें| ते दुःखी होती स्वयें ||१०१||
संसारीं सुख मानिती| ते प्राणी मूढमती |
जाणोन डोळे झांकिती| पढतमूर्ख ||१०२||
प्रपंच सुखें करावा| परी कांहीं परमार्थ वाढवावा |
परमार्थ अवघाचि बुडवावा| हें विहित नव्हे ||१०३||
मागां जालें निरूपण| गुरुशिष्यांची वोळखण |
आतां उपदेशाचें लक्षण| सांगिजेल ||१०४||
इति श्रीदासबोधे गुरुशिष्यसंवादे शिष्यलक्षणनाम
समास तिसरा ||३||५. ३
समास चवथा : उपदेशलक्षण
||श्रीराम ||
ऐका उपदेशाचीं लक्षणें| बहुविधें कोण कोणें |
सांगतां तें असाधारणें| परी कांहीं येक सांगों ||१||
बहुत मंत्र उपदेशिती| कोणी नाम मात्र सांगती |
येक ते जप करविती| वोंकाराचा ||२||
शिवमंत्र भवानीमंत्र| विष्णुमंत्र माहाल्क्ष्मीमंत्र |
अवधूतमंत्र गणेशमंत्र| मार्तंडमंत्र सांगती ||३||
मछकूर्मवऱ्हावमंत्र| नृसिंहमंत्र वामनमंत्र |
भार्गवमंत्र रघुनाथमंत्र| कृष्णमंत्र सांगती ||४||
भैरवमंत्र मल्लारिमंत्र| हनुमंतमंत्र येक्षिणीमंत्र |
नारायेणमंत्र पांडुरंगमंत्र| अघोरमंत्र सांगती ||५||
शेषमंत्र गरुडमंत्र| वायोमन्त्र वेताळमंत्र |
झोटिंगमंत्र बहुधा मंत्र| किती म्हणौनि सांगावे ||६||
बाळामंत्र बगुळामंत्र| काळिमंत्र कंकाळिमंत्र |
बटुकमंत्र नाना मंत्र| नाना शक्तींचे ||७||
पृथकाकारें स्वतंत्र| जितुके देव तितुके मंत्र |
सोपे अवघड विचित्र| खेचर दारुण बीजाचे ||८||
पाहों जातां पृथ्वीवरी| देवांची गणना कोण करी |
तितुके मंत्र वैखरी| किती म्हणौनि वदवावी ||९||
असंख्यात मंत्रमाळा| येकाहूनि येक आगळा |
विचित्र मायेची कळा| कोण जाणे ||१०||
कित्येक मंत्रीं भूतें जाती| कित्येक मंत्रीं वेथा नासती |
कित्येक मंत्रीं उतरती| सितें विंचू विखार ||११||
ऐसे नाना परीचे मंत्री| उपदेशिती कर्णपात्रीं |
जप ध्यान पूजा यंत्री| विधानयुक्त सांगती ||१२||
येक शिव शिव सांगती| | येक हरि हरि म्हणविती |
येक उपदेशिती| विठल विठल म्हणोनी ||१३||
येक सांगती कृष्ण कृष्ण| येक सांगती विष्ण विष्ण |
येक नारायण नारायण| म्हणौन उपदेशिती ||१४||
येक म्हणती अच्युत अच्युत| येक म्हणती अनंत अनंत |
येक सांगती दत्त दत्त| म्हणत जावें ||१५||
येक सांगती राम राम| येक सांगती ॐ ॐ म |
येक म्हणती मेघशाम| बहुतां नामीं स्मरावा ||१६||
येक सांगती गुरु गुरु| येक म्हणती परमेश्वरु |
येक म्हणती विघ्नहरु| चिंतीत जावा ||१७||
येक सांगती शामराज| येक सांगती गरुडध्वज |
येक सांगती अधोक्षज| म्हणत जावें ||१८||
येक सांगती देव देव| येक म्हणती केशव केशव |
येक म्हणती भार्गव भार्गव| म्हणत जावें ||१९||
येक विश्वनाथ म्हणविती| येक मल्लारि सांगती |
येक ते जप करविती| तुकाई तुकाई म्हणौनी ||२०||
हें म्हणौनी सांगावें| शिवशक्तीचीं अनंत नांवें |
इछेसारिखीं स्वभावें| उपदेशिती ||२१||
येक सांगती मुद्रा च्यारी| खेचरी भूचरी चाचरी अगोचरी |
येक आसनें परोपरी| उपदेशिती ||२२||
येक दाखविती देखणी| येक अनुहातध्वनी |
येक गुरु पिंडज्ञानी| पिंडज्ञान सांगती ||२३||
येक संगती कर्ममार्ग| येक उपासनामार्ग |
येक सांगती अष्टांग योग| नाना चक्रें ||२४||
येक तपें सांगती| येक अजपाअ निरोपिती |
येक तत्वें विस्तारिती , तत्वज्ञानी ||२५||
येक सांगती सगुण| येक निरोपिती निर्गुण |
येक उपदेशिती तीर्थाटण| फिरावें म्हणूनी ||२६||
येक माहावाक्यें सांगती| त्यांचा जप करावा म्हणती |
येक उपदेश करिती| सर्व ब्रह्म म्हणोनी ||२७||
येक शाक्तमार्ग सांगती| येक मुक्तमार्ग प्रतिष्ठिती |
येक इंद्रियें पूजन करविती| येका भावें ||२८||
येक सांगती वशीकर्ण| स्तंबन मोहन उच्चाटण |
नाना चेटकें आपण| स्वयें निरोपिती ||२९||
ऐसी उपदेशांची स्थिती| पुरे आतां सांगों किती |
ऐसे हे उपदेश असती| असंख्यात| ३०||
ऐसे उपदेश अनेक| परी ज्ञानेविण निरार्थक |
येविषईं असे येक| भगवद्वचन ||३१||
श्लोक ||नानाशास्त्रं पठेल्लोको नाना दैवतपूजनम् |
आत्मज्ञानं विना पार्थ सर्वकर्म निरर्थकम् ||
शैवशाक्तागमाद्या ये अन्ये च बहवो मताः |
अपभ्रंशसमास्तेऽपि जीवानां भ्रांतचेतसाम् ||
न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिदमुत्तमम् ||
याकारणें ज्ञानासमान| पवित्र उत्तम न दिसे अन्न |
म्हणौन आधीं आत्मज्ञान| साधिलें पाहिजे ||३२||
सकळ उपदेशीं विशेष| आत्मज्ञानाचा उपदेश |
येविषईं जगदीश| बहुतां ठाईं बोलिला ||३३||
श्लोक ||यस्य कस्य च वर्णस्य ज्ञानं देहे प्रतिष्ठितम् |
तस्य दासस्य दासोहं भवे जन्मनि जन्मनि ||
आत्मज्ञानाचा महिमा| नेणे चतुर्मुख ब्रह्मा |
प्राणी बापुडा जीवात्मा| काये जाणे ||३४||
सकळ तीर्थांची संगती| स्नानदानाची फळश्रुती |
त्याहूनि ज्ञानाची स्थिती| विशेष कोटिगुणें ||३५||
श्लोक: ||पृथिव्यां यानि तीर्थानि स्नानदानेषु यत्फलम् |
तत्फलं कोटिगुणितं ब्रह्मज्ञानसमोपमम् ||
म्हणौनि जें आत्मज्ञान| तें गहनाहूनि गहन |
ऐक तयाचें लक्षण| सांगिजेल ||३६||
इति श्रीदासबोधे गुरुशिष्यसंवादे उपदेशनाम
समास चवथा ||४||५. ४
समास पाचवा : बहुधाज्ञान निरूपण
||श्रीराम ||
जंव तें ज्ञान नाहीं प्रांजळ| तंव सर्व कांहीं निर्फळ |
ज्ञानरहित तळमळ| जाणार नाहीं ||१||
ज्ञान म्हणतां वाटे भस्म| काये रे बा असेल वर्म |
म्हणौनि हा अनुक्रम| सांगिजेल आतां ||२||
भूत भविष्य वर्तमान| ठाऊकें आहे परिछिन्न |
यासीहि म्हणिजेत ज्ञान| परी तें ज्ञान नव्हे ||३||
बहुत केलें विद्यापठण| संगीतशास्त्र रागज्ञान |
वैदिक शास्त्र वेदाधेन| हेंहि ज्ञान नव्हे ||४||
नाना वेवसायाचें ज्ञान| नाना दिक्षेचें ज्ञान |
नाना परीक्षेचें ज्ञान| हें ज्ञान नव्हे ||५||
नाना वनितांची परीक्षा| नाना मनुष्यांची परीक्षा |
नाना नरांची परीक्षा| हें ज्ञान नव्हे ||६||
नाना अश्वांची परीक्षा| नाना गजांची परीक्षा |
नाना स्वापदांची परीक्षा| हें ज्ञान नव्हे ||७||
नाना पशूंची परीक्षा| नाना पक्षांची परीक्षा |
नाना भूतांची परीक्षा| हें ज्ञान नव्हे ||८||
नाना यानांची परीक्षा| नाना वस्त्रांची परीक्षा |
नाना शस्त्रांची परीक्षा| हें ज्ञान नव्हे ||९||
नाना धातूंची परीक्षा| नाना नाण्यांची परीक्षा |
नाना रत्नांची परीक्षा| हें ज्ञान नव्हे ||१०||
नाना पाषाण परीक्षा| नाना काष्ठांची परीक्षा |
नाना वाद्यांची परीक्षा| हें ज्ञान नव्हे ||११||
नाना भूमींची परीक्षा| नाना जळांची परीक्षा |
नाना सतेज परीक्षा| हें ज्ञान नव्हे ||१२||
नाना रसांची परीक्षा| नाना बीजांची परीक्षा |
नाना अंकुर परीक्षा| हें ज्ञान नव्हे ||१३||
नाना पुष्पांची परीक्षा| नाना फळांची परीक्षा |
नाना वल्लींची परीक्षा| हें ज्ञान नव्हे ||१४||
नाना दुःखांची परीक्षा| नाना रोगांची परीक्षा |
नाना चिन्हांची परीक्षा| हें ज्ञान नव्हे ||१५||
नाना मंत्रांची परीक्षा| नाना यंत्रांची परीक्षा |
नाना मूर्तींची परीक्षा| हें ज्ञान नव्हे ||१६||
नाना क्षत्रांची परीक्षा| नाना गृहांची परीक्षा |
नाना पात्रांची परीक्षा| हें ज्ञान नव्हे ||१७||
नाना होणार परीक्षा| नाना समयांची परीक्षा |
नाना तर्कांची परीक्षा| हें ज्ञान नव्हे ||१८||
नाना अनुमान परीक्षा| नाना नेमस्त परीक्षा |
नाना प्रकार परीक्षा| हें ज्ञान नव्हे ||१९||
नाना विद्येची परीक्षा| नाना कळेची परीक्षा |
नाना चातुर्य परीक्षा| हें ज्ञान नव्हे ||२०||
नाना शब्दांची परीक्षा| नाना अर्थांची परीक्षा |
नाना भाषांची परीक्षा| हें ज्ञान नव्हे ||२१||
नाना स्वरांची परीक्षा| नाना वर्णांची परीक्षा |
नाना लेक्षनपरीक्षा| हें ज्ञान नव्हे ||२२||
नाना मतांची परीक्षा| नाना ज्ञानांची परीक्षा |
नाना वृत्तींची परीक्षा| हें ज्ञान नव्हे ||२३||
नाना रूपांची परीक्षा| नाना रसनेची परीक्षा |
नाना सुगंधपरीक्षा| हें ज्ञान नव्हे ||२४||
नाना सृष्टींची परीक्षा| नाना विस्तारपरीक्षा |
नाना पदार्थपरीक्षा| हें ज्ञान नव्हे ||२५||
नेमकेचि बोलणें| तत्काळचि प्रतिवचन देणें |
सीघ्रचि कवित्व करणें| हें ज्ञान नव्हे ||२६||
नेत्रपालवी नादकळा| करपालवी भेदकळा |
स्वरपालवी संकेतकळा| हें ज्ञान नव्हे ||२७||
काव्यकुशळ संगीतकळा| गीत प्रबंद नृत्यकळा |
सभाच्यातुर्य शब्दकळा| हें ज्ञान नव्हे ||२८||
वग्विळास मोहनकळा| रम्य रसाळ गायनकळा |
हास्य विनोद कामकळा| हें ज्ञान नव्हे ||२९||
नाना लाघवें चित्रकळा| नाना वाद्यें संगीतकळा |
नाना प्रकारें विचित्र कळा| हें ज्ञान नव्हे ||३०||
आदिकरूनि चौसष्टि कळा| याहि वेगळ्या नाना कळा |
चौदा विद्या सिद्धि सकळा| हें ज्ञान नव्हे ||३१||
असो सकळ कळाप्रवीण| विद्यामात्र परिपूर्ण |
तरी ते कौशल्यता, परी ज्ञान- | म्हणोंचि नये ||३२||
हें ज्ञान होयेसें भासे| परंतु मुख्य ज्ञान तें अनारिसें |
जेथें प्रकृतीचें पिसें| समूळ वाव ||३३||
जाणावें दुसर्याचें जीवीचें| हे ज्ञान वाटे साचें |
परंतु हें आत्मज्ञानाचें| लक्षण नव्हे ||३४||
माहानुभाव माहाभला| मानसपूजा करितां चुकला |
कोणी येकें पाचारिला| ऐसें नव्हे म्हणोनी ||३५||
ऐसी जाणे अंतरस्थिती| तयासि परम ज्ञाता म्हणती |
परंतु जेणें मोक्षप्राप्ती| तें हें ज्ञान नव्हे ||३६||
बहुत प्रकारींची ज्ञानें| सांगों जातां असाधारणें |
सायोज्यप्राप्ती होये जेणें| तें ज्ञान वेगळें ||३७||
तरी तें कैसें आहे ज्ञान| समाधानाचें लक्षण |
ऐसें हें विशद करून| मज निरोपावें ||३८||
ऐसें शुद्ध ज्ञान पुसिलें| तें पुढिले समासीं निरोपिलें |
श्रोतां अवधान दिधलें| पाहिजे पुढें ||३९||
इति श्रीदासबोधे गुरुशिष्यसंवादे बहुधाज्ञाननाम
समास पंचवा ||५||५. ५
समास सहावा : शुद्धज्ञान निरूपण
||श्रीराम ||
ऐक ज्ञानाचें लक्षण| ज्ञान म्हणिजे आत्मज्ञान |
पाहावें आपणासि आपण| या नांव ज्ञान ||१||
मुख्य देवास जाणावें| सत्य स्वरूप वोळखावें |
नित्यानित्य विचारावें| या नांव ज्ञान ||२||
जेथें दृश्य प्रकृति सरे| पंचभूतिक वोसरे |
समूळ द्वैत निवारे| या नांव ज्ञान ||३||
मनबुद्धि अगोचर| न चले तर्काचा विचार |
उल्लेख परेहुनि पर| या नांव ज्ञान ||४||
जेथें नाहीं दृश्यभान| जेथें जाणीव हें अज्ञान |
विमळ शुद्ध स्वरूपज्ञान| यासि बोलिजे ||५||
सर्वसाक्षी अवस्ता तुर्या| ज्ञान ऐसें म्हणती तया |
परी तें जाणिजे वायां| पदार्थज्ञान ||६||
दृश्य पदार्थ जाणिजे| त्यास पदार्थज्ञान बोलिजे |
शुद्ध स्वरूप जाणिजे| या नांव स्वरूपज्ञान ||७||
जेथें सर्वचि नाहीं ठाईंचें| तेथें सर्वसाक्षत्व
कैंचें |
म्हणौनि शुद्ध ज्ञान तुर्येचें| मानूंचि नये ||८||
ज्ञान म्हणिजे अद्वैत| तुर्या प्रत्यक्ष द्वैत |
म्हणौनि शुद्ध ज्ञान सतंत| वेगळेंचि असे ||९||
ऐक शुद्ध ज्ञानाचें लक्षण| शुद्ध स्वरूपचि आपण |
या नांव शुद्ध स्वरूपज्ञान| जाणिजे श्रोतीं ||१०||
माहावाक्यौपदेश भला| परी त्याचा जप नाहीं बोलिला |
तेथीचा तो विचारचि केला| पाहिजे साधकें ||११||
माहावाक्य उपदेशसार| परी घेतला पाहिजे विचार |
त्याच्या जपें, अंधकार- | न फिटे भ्रांतीचा ||१२||
माहावाक्याचा अर्थ घेतां| आपण वस्तुचि तत्वतां |
त्याचा जप करितां वृथा| सीणचि होये ||१३||
माहावाक्याशें विवरण| हें मुख्य ज्ञानाचें लक्षण |
शुद्ध लक्ष्यांचें आपण| वस्तुच आहे ||१४||
आपला आपणासि लाभ| हें ज्ञान परम दुल्लभ |
जें आदिअंतीं स्वयंभ| स्वरूपचि स्वयें ||१५||
जेथून हें सर्व ही प्रगटे| आणि सकळही जेथें आटे |
तें ज्ञान जालियां फिटे| भ्रांति बंधनाची ||१६||
मतें आणी मतांतरें| जेथें होती निर्विकारें |
अतिसूक्ष्म विचारें| पाहातां ऐक्य ||१७||
जे या चराचराचें मूळ| शुद्ध स्वरूप निर्मळ |
या नांव ज्ञान केवळ| वेदांतमतें ||१८||
शोधितां आपलें मूळ स्थान| सहजचि उडे अज्ञान |
या नांव म्हणिजे ब्रह्मज्ञान| मोक्षदायेक ||१९||
आपणासि वोळखों जातां| आंगीं बाणे सर्वज्ञता |
तेणें येकदेसी वार्ता| निशेष उडे ||२०||
मी कोण ऐसा हेत- | धरून, पाहातां देहातीत |
आवलोकितां नेमस्त| स्वरूपचि होये ||२१||
असो पूर्वीं थोर थोर| जेणें ज्ञानें पैलपार- |
पावले, ते साचार| ऐक आतां ||२२||
व्यास वसिष्ठ माहामुनी| शुक नारद समाधानी |
जनकादिक माहाज्ञानी| येणेंचि ज्ञानें ||२३||
वामदेवादिक योगेश्वर| वाल्मीक अत्रि ऋषेश्वर |
शोनिकादि अध्यात्मसार| वेदांतमतें ||२४||
सनकादिक मुख्यकरूनी| आदिनाथ मीन गोरक्षमुनी |
आणीक बोलतां वचनी| अगाध असती ||२५||
सिद्ध मुनी माहानुभाव| सकळांचा जो अंतर्भाव |
जेणें सुखें माहादेव| डुल्लत सदा ||२६||
जें वेदशास्त्रांचें सार| सिद्धांत धादांत विचार |
ज्याची प्राप्ती भाग्यानुसार| भाविकांस होये ||२७||
साधु संत आणी सज्जन| भूत भविष्य वर्तमान |
सर्वत्रांचें गुह्य ज्ञान| तें संगिजेल आतां ||२८||
तीर्थें व्रतें तपें दानें| जें न जोडे धूम्रपानें |
पंचाग्नी गोरांजनें| जें प्राप्त नव्हे ||२९||
सकळ साधनाचें फळ| ज्ञानाची सिगचि केवळ |
जेणें संशयाचें मूळ| निशेष तुटे ||३०||
छपन्न भाषा तितुके ग्रंथ| आदिकरून वेदांत |
या इतुकियांचा गहनार्थ| येकचि आहे ||३१||
जें नेणवे पुराणीं| जेथें सिणल्या वेदवाणी |
तेंचि आतां येचि क्षणीं| बोधीन गुरुकृपें ||३२||
पाहिलें नस्तां संस्कृतीं| रीग नाहीं मऱ्हाष्ट ग्रंथीं |
हृदईं वसल्या कृपामुर्ती| सद्गुरु स्वामी ||३३||
आतां नलगे संस्कृत| अथवा ग्रंथ प्राकृत |
माझा स्वामी कृपेसहित| हृदईं वसे ||३४||
न करितां वेदाभ्यास| अथवा श्रवणसायास |
प्रेत्नेंविण सौरस| सद्गुरुकृपा ||३५||
ग्रंथ मात्र मऱ्हाष्ट| त्याहून संस्कृत श्रेष्ठ |
त्या संस्कृतामधें पष्ट| थोर तो वेदांत ||३६||
त्या वेदांतापरतें कांहीं| सर्वथा श्रेष्ठ नाहीं |
जेथें वेदगर्भ सर्वही| प्रगटजाला ||३७||
असो ऐसा जो वेदांत| त्या वेदांताचाहि मथितार्थ |
अतिगहन जो परमार्थ| तो तूं ऐक आतां ||३८||
अरे गहनाचेंही गहन| तें तूं जाण सद्गुरुवचन |
सद्गुरुवचनें समाधान| नेमस्त आहे ||३९||
सद्गुरुवचन तोचि वेदांत| सद्गुरुवचन तोचि सिद्धांत |
सद्गुरुवचन तोचि धादांत| सप्रचीत आतां ||४०||
जें अत्यंत गहन| माझ्या स्वामीचें वचन |
जेणें माझे समाधान| अत्यंत जालें ||४१||
तें हें माझें जीवीचें गुज| मी सांगैन म्हणतों तुज |
जरी अवधान देसी मज ||तरी आतां येच क्षणीं ||४२||
शिष्य म्लान्वदनें बोले| धरिले सदृढ पाउले |
मग बोलों आरंभिलें| गुरुदेवें ||४३||
अहं ब्रह्मास्मि माहांवाक्य| येथीचा अर्थ अतर्क्ये |
तोही सांगतों, ऐक्य- | गुरुशिष्य जेथें ||४४||
ऐक शिष्या येथीचें वर्म| स्वयें तूंचि आहेसि ब्रह्म |
ये विषईं संदेह भ्रम| धरूंचि नको ||४५||
नवविधा प्रकारें भजन| त्यांत मुख्य तें आत्मनिवेदन |
तें समग्र प्रकारें कथन| कीजेल आतां ||४६||
निर्माण पंचभूतें यीयें| कल्पांतीं नासतीं येथान्वयें |
प्रकृति पुरुष जीयें| तेही ब्रह्म होती ||४७||
दृश्य पदार्थ आटतां| आपणहि नुरे तत्वतां |
ऐक्यरूपें ऐक्यता| मुळींच आहे ||४८||
सृष्टीची नाहीं वार्ता| तेथें मुळींच ऐक्यता |
पिंड ब्रह्मांड पाहों जातां| दिसेल कोठें ||४९||
ज्ञानवन्ही प्रगटे| तेणें दृश्य केर आटे |
तदाकारें मूळ तुटे| भिन्नत्वाचें ||५०||
मिथ्यत्वें वृत्ति फिरे| तों दृश्य असतांच वोसरे |
सहजचि येणें प्रकारें| जालें आत्मनिवेदन ||५१||
असो गुरूचे ठाईं अनन्यता| तरी तुज कायेसी रे चिंता |
वेगळेंपणें अभक्ता| उरोंचि नको ||५२||
आतां हेंचि दृढीकर्ण- | व्हावया, करीं सद्गुरुभजन |
सद्गुरुभजनें समाधान| नेमस्त आहे ||५३||
या नांव शिष्या आत्मज्ञान| येणें पाविजे समाधान |
भवभयाचें बंधन| समूळ मिथ्या ||५४||
देह मी वाटे ज्या नरा| तो जाणावा आत्महत्यारा |
देहाभिनानें येरझारा| भोगिल्याच भोगी ||५५||
असो चहूं देहावेगळा| जन्मकर्मासी निराळा |
सकळ आबाळगोबळा| सबाह्य तूं ||५६||
कोणासीच नाहीं बंधन| भ्रांतिस्तव भुलले जन |
दृढ घेतला देहाभिमान| म्हणौनियां ||५७||
शिष्या येकांतीं बैसावें| स्वरूपीं विश्रांतीस जावें |
तेणें गुणें दृढावे| परमार्थ हा ||५८||
अखंड घडे श्रवणमनन| तरीच पाविजे समाधान |
पूर्ण जालियां ब्रह्मज्ञान| वैराग्य भरे आंगीं ||५९||
शिष्या मुक्तपणें अनर्गळ| करिसीं इंद्रियें बाष्कळ |
तेणें तुझी तळमळ| जाणार नाहीं ||६०||
विषईं वैराग्य उपजलें| तयासीच पूर्ण ज्ञान जालें |
मणी टाकितांचि लाधलें| राज्य जेवीं ||६१||
मणी होतां सीगटाचा| लोभ धरूनिया तयाचा |
मूर्खपणें राज्याचा| अव्हेर केला ||६२||
ऐक शिष्या सावधान| आतां भविष्य मी सांगेन |
जया पुरुषास जें ध्यान| तयासि तेंचि प्राप्त ||६३||
म्हणोनि जे अविद्या| सांडून धरावी सुविद्या |
तेणें गुणें जगद्वंद्या| पाविजे सीघ्र ||६४||
सन्यपाताचेनि दुःखें| भयानक दृष्टीस देखे |
औषध घेतांचि सुखें| आनंद पावे ||६५||
तैसें अज्ञानसन्यपातें| मिथ्या दृष्टीस दिसतें |
ज्ञानाउषध घेतां तें| मुळींच नाहीं ||६६||
मिथ्या स्वप्नें वोसणाला| तो जागृतीस आणिला |
तेणें पूर्वदशा पावला| निर्भय जे ||६७||
मिथ्याच परी सत्य वाटलें| तेणें गुणें दुःख जालें |
मिथ्या आणी निरसलें| हें तों घडेना ||६८||
मिथ्या आहे जागृतासी| परी वेढा लाविलें निद्रिस्तांसी |
जागा जालियां तयासी| भयेंचि नाहीं||६९||
परी अविद्याझोंप येते भरें| भरे सर्वांगी काविरें |
पूर्ण जागृती श्रवणद्वारें- | मननें करावी ||७०||
जागृतीची वोळखण| ऐक तयाचें लक्षण |
जो विषईं विरक्त पूर्ण| अंतरापासुनी ||७१||
जेणें विरक्तीस न यावें| तो साधक ऐसें जाणावें |
तेणें साधन करावें| थोरीव सांडुनी ||७२||
साधन न मने जयाला| तो सिद्धपणे बद्ध जाला |
त्याहूनि मुमुक्ष भला| ज्ञानाधिकारी ||७३||
तंव शिष्यें केला प्रश्न| कैसें बद्धमुमुक्षाचें लक्षण |
साधक सिद्ध वोळखण| कैसी जाणावी ||७४||
याचें उत्तर श्रोतयांसी| दिधलें पुढिलीये समासीं |
सावध श्रोतीं कथेसी| अवधान द्यावें ||७५||
इति श्रीदासबोधे गुरुशिष्यसंवादे शुद्धज्ञाननिरूपणनाम
समास सहावा ||६||५. ६
समास सातवा : बद्धलक्षण
||श्रीराम ||
सृष्टी जे कां चराचर| जीव दाटले अपार |
परी ते अवघे चत्वार| बोलिजेती ||१||
ऐक तयांचें लक्षण| चत्वार ते कोण कोण |
बद्ध मुमुक्ष साधक जाण| चौथा सिद्ध ||२||
यां चौघांविरहित कांहीं| सचराचरीं पांचवा नाहीं |
आतां असो हें सर्वही| विशद करूं ||३||
बद्ध म्हणिजे तो कोण| कैसें मुमुक्षाचें लक्षण |
साधकसिद्धवोळखण| कैसी जाणावी ||४||
श्रोतीं व्हावें सावध| प्रस्तुत ऐका बद्ध |
मुमुक्ष साधक आणि सिद्ध| पुढें निरोपिले ||५||
आतां बद्ध तो जाणिजे ऐसा| अंधारींचा अंध जैसा |
चक्षुविण दाही दिशा| सुन्याकार ||६||
भक्त ज्ञाते तापसी| योगी वीतरागी संन्यासी |
पुढें देखतां दृष्टीसी| येणार नाहीं ||७||
न दिसे नेणे कर्माकर्म| न दिसे नेणे धर्माधर्म |
न दिसे नेणे सुगम| परमार्थपंथ ||८||
तयास न दिसे सच्छास्त्र| सत्संगति सत्पात्र |
सन्मार्ग जो कां पवित्र| तो ही न दिसे ||९||
न कळे सारासार विचार| न कळे स्वधर्म आचार |
न कळे कैसा परोपकार| दानपुण्य ||१०||
नाहीं पोटीं भूतदया| नाहीं सुचिष्मंत काया |
नाहीं जनासि निववावया| वचन मृद ||११||
न कळे भक्ति न कळे ज्ञान| न कळे वैराग्य न कळे ध्यान |
न कळे मोक्ष न कळे साधन| या नांव बद्ध ||१२||
न कळे देव निश्चयात्मक| न कळे संतांचा विवेक |
न कळे मायेचें कौतुक| या नांव बद्ध ||१३||
न कळे परमार्थाची खूण| न कळे अध्यात्मनिरूपण |
न कळे आपणासि आपण| या नांव बद्ध ||१४||
न कळे जीवाचें जन्ममूळ| न कळे साधनाचें फळ |
न कळे तत्वतां केवळ| या नांव बद्ध ||१५||
न कळे कैसें तें बंधन| न कळे मुक्तीचें लक्षण |
न कळे वस्तु विलक्षण| या नांव बद्ध ||१६||
न कळे शास्त्रार्थ बोलिला| न कळे निजस्वार्थ आपुला |
न कळे संकल्पें बांधला| या नांव बद्ध ||१७||
जयासि नाहीं आत्मज्ञान| हें मुख्य बद्धाचें लक्षण |
तीर्थ व्रत दान पुण्य| कांहींच नाहीं ||१८||
दया नाहीं करुणा नाहीं| आर्जव नाहीं मित्रि नाहीं |
शांति नाहीं क्ष्मा नाहीं| या नांव बद्ध ||१९||
जें ज्ञानविशिं उणें| तेथें कैचीं ज्ञानाचीं लक्षणें |
बहुसाल कुलक्षणें| या नांव बद्ध ||२०||
नाना प्रकारीचे दोष- | करितां, वाटे परम संतोष |
बाष्कळपणाचा हव्यास| या नांव बद्ध ||२१||
बहु काम बहु क्रोध| बहु गर्व बहु मद |
बहु द्वंद बहु खेद| या नांव बद्ध ||२२||
बहु दर्प बहु दंभ| बहु विषये बहु लोभ |
बहु कर्कश बहु अशुभ| या नांव बद्ध ||२३||
बहु ग्रामणी बहु मत्सर| बहु असूया तिरस्कार |
बहु पापी बहु विकार| या नांव बद्ध ||२४||
बहु अभिमान बहु ताठा| बहु अहंकार बहु फांटा |
बहु कुकर्माचा सांठा| या नांव बद्ध ||२५||
बहु कापट्य वादवेवाद| बहु कुतर्क भेदाभेद |
बहु क्रूइर कृपामंद| या नांव बद्ध ||२६||
बहु निंदा बहु द्वेष| बहु अधर्म बहु अभिळाष |
बहु प्रकारीचे दोष| या नांव बद्ध ||२७||
बहु भ्रष्ट अनाचार| बहु नष्ट येकंकार |
बहु आनित्य अविचार| या नांव बद्ध ||२८||
बहु निष्ठुर बहु घातकी| बहु हत्यारा बहु पातकी |
तपीळ कुविद्या अनेकी| या नांव बद्ध ||२९||
बहु दुराशा बहु स्वार्थी| बहु कळह बहु अनर्थी |
बहु डाईक दुर्मती| या नांव बद्ध ||३०||
बहु कल्पना बहु कामना| बहु तृष्णा बहु वासना |
बहु ममता बहु भावना| या नांव बद्ध ||३१||
बहु विकल्पी बहु विषादी| बहु मूर्ख बहु समंधी |
बहु प्रपंची बहु उपाधी| या नांव बद्ध ||३२||
बहु वाचाळ बहु पाषंडी| बहु दुर्जन बहु थोतांडी |
बहु पैशून्य बहु खोडी| या नांव बद्ध ||३३||
बहु अभाव बहु भ्रम| बहु भ्रांति बहु तम |
बहु विक्षेप बहु विराम| या नांव बद्ध ||३४||
बहु कृपण बहु खंदस्ती| बहु आदखणा बहु मस्ती |
बहु असत्क्रिया व्यस्ती| या नांव बद्ध ||३५||
परमार्थविषईं अज्ञान| प्रपंचाचें उदंड ज्ञान |
नेणे स्वयें समाधान| या नांव बद्ध ||३६||
परमार्थाचा अनादर| प्रपंचाचा अत्यादर |
संसारभार जोजार| या नांव बद्ध ||३७||
सत्संगाची नाहीं गोडी| संतनिंदेची आवडी |
देहेबुद्धीची घातली बेडी| या नाव बद्ध ||३८||
हातीं द्रव्याची जपमाळ| कांताध्यान सर्वकाळ |
सत्संगाचा दुष्काळ| या नांव बद्ध ||३९||
नेत्रीं द्रव्य दारा पाहावी| श्रवणीं द्रव्य दारा ऐकावी |
चिंतनीं द्रव्य दारा चिंतावी| या नांव बद्ध ||४०||
काया वाचा आणि मन| चित्त वित्त जीव प्राण |
द्रव्यदारेचें करी भजन| या नांव बद्ध ||४१||
इंद्रियें करून निश्चळ| चंचळ होऊं नेदी पळ |
द्रव्यदारेसि लावी सकळ| या नांव बद्ध ||४२||
द्रव्य दारा तेंचि तीर्थ| द्रव्य दारा तोचि परमार्थ |
द्रव्य दारा सकळ स्वार्थ| म्हणे तो बद्ध ||४३||
वेर्थं जाऊं नेदी काळ| संसारचिंता सर्वकाळ |
कथा वार्ता तेचि सकळ| या नांव बद्ध ||४४||
नाना चिंता नाना उद्वेग| नाना दुःखाचे संसर्ग |
करी परमार्थाचा त्याग| या नांव बद्ध ||४५||
घटिका पळ निमिष्यभरी| दुश्चीत नव्हतां अंतरीं |
सर्वकाळ ध्यान करी| द्रव्यदाराप्रपंचाचें ||४६||
तीर्थ यात्रा दान पुण्य| भक्ति कथा निरूपण |
मंत्र पूजा जप ध्यान| सर्वही द्रव्य दारा ||४७||
जागृति स्वप्न रात्रि दिवस| ऐसा लागला विषयेध्यास |
नाहीं क्षणाचा अवकाश| या नांव बद्ध ||४८||
ऐसें बद्धाचें लक्षण| मुमुक्षपणीं पालटे जाण |
ऐक तेही वोळखण| पुढिलीये समासीं ||४९||
इति श्रीदासबोधे गुरुशिष्यसंवादे बद्धलक्षणनाम
समास सातवा ||७||५. ७
समास आठवा : मुमुक्षलक्षण
||श्रीराम ||
संसारमदाचेनि गुणें| नाना हीनें कुलक्षणें |
जयाचेनि मुखावलोकनें| दोषचि लागे ||१||
ऐसा प्रणी जो कां बद्ध| संसारीं वर्ततां अबद्ध |
तायस प्राप्त जाला खेद| काळांतरीं ||२||
संसारदुःखें दुखवला| त्रिविधतापें पोळला |
निरूपणें प्रस्तावला| अंतर्यामीं ||३||
जाला प्रपंचीं उदास| मनें घेतला विषयत्रास |
म्हणे आतां पुरे सोस| संसारींचा ||४||
प्रपंच जाईल सकळ| येथील श्रम तों निर्फळ |
आतां कांहीं आपुला काळ| सार्थक करूं ||५||
ऐसी बुद्धि प्रस्तावली| पोटीं आवस्ता लागली |
म्हणे माझी वयेसा गेली| वेर्थचि आवघी ||६||
पूर्वी नाना दोष केले| ते अवघेचि आठवले |
पुढें येउनि उभे ठेले| अंतर्यामीं ||७||
आठवे येमाची यातना| तेणें भयेचि वाटे मना |
नाहीं पापासि गणना| म्हणौनियां ||८||
नाहीं पुण्याचा विचार| जाले पापाचे डोंगर |
आतां दुस्तर हा संसार| कैसा तरों ||९||
आपले दोष आछ्यादिले| भल्यांस गुणदोष लाविले |
देवा म्यां वेर्थच निंदिले| संत साधु सज्जन ||१०||
निंदे ऐसे नाहीं दोष| तें मज घडले कीं विशेष |
माझे अवगुणीं आकाश| बुडों पाहे ||११||
नाहीं वोळखिले संत| नाहीं अर्चिला भगवंत |
नाहीं अतित अभ्यागत| संतुष्ट केले ||१२||
पूर्व पाप वोढवलें| मज कांहींच नाहीं घडलें |
मन अव्हाटीं पडिलें| सर्वकाळ ||१३||
नाहीं कष्टविलें शेरीर| नाहीं केला परोपकार |
नाहीं रक्षिला आचार| काममदें ||१४||
भक्तिमाता हे बुडविली| शांति विश्रांति मोडिली |
मूर्खपणें म्यां विघडिली| सद्बुद्धि सद्वासना ||१५||
आतां कैसें घडे सार्थक| दोष केले निरार्थक |
पाहों जातां विवेक| उरला नाहीं ||१६||
कोण उपाये करावा| कैसा परलोक पावावा |
कोण्या गुणें देवाधिदेवा| पाविजेल ||१७||
नाहीं सद्भाव उपजला| अवघा लोकिक संपादिला |
दंभ वरपंगें केला| खटाटोप कर्माचा ||१८||
कीर्तन केलें पोटासाठीं| देव मांडिले हाटवटीं |
आहा देवा बुद्धि खोटी| माझी मीच जाणें ||१९||
पोटीं धरूनि अभिमान| शब्दीं बोले निराभिमान |
अंतरीं वांछूनियां धन| ध्यानस्त जालों ||२०||
वित्पत्तीनें लोक भोंदिले| पोटासाठीं संत निंदिले |
माझे पोटीं दोष भरले| नाना प्रकारींचे ||२१||
सत्य तेंचि उछेदिलें| मिथ्य तेंचि प्रतिपादलें |
ऐसें नाना कर्म केलें| उदरंभराकारणें ||२२||
ऐसा पोटीं प्रस्तावला| निरूपणें पालटला |
तोचि मुमुक्ष बोलिला| ग्रंथांतरीं ||२३||
पुण्यमार्ग पोटीं धरी| सत्संगाची वांछा करी |
विरक्त जाला संसारीं| या नांव मुमुक्ष ||२४||
गेले राजे चक्रवर्ती| माझें वैभव तें किती |
म्हणे धरूं सत्संगती| या नांव मुमुक्ष ||२५||
आपुले अवगुण देखे| विरक्तिबळें वोळखे |
आपणासि निंदी दुःखें| या नांव मुमुक्ष ||२६||
म्हणे मी काये अनोपकारी| म्हणे मी काय दंभधारी |
म्हणे मी काये अनाचारी| या नांव मुमुक्ष ||२७||
म्हणे मी पतित चांडाळ| म्हणे मी दुराचारी खळ |
म्हणे मी पापी केवळ| या नांव मुमुक्ष ||२८||
म्हणे मी अभक्त दुर्जन| म्हणे मी हीनाहूनि हीन |
म्हणे मी जन्मलो पाषाण| या नांव मुमुक्ष ||२९||
म्हणे मी दुराभिमानी| म्हणे मी तपीळ जनीं |
म्हणे मी नाना वेसनी| या नांव मुमुक्ष ||३०||
म्हणे मी आळसी आंगचोर| म्हणे मी कपटी कातर |
म्हणे मी मूर्ख अविचार| या नांव मुमुक्ष ||३१||
म्हणे मी निकामी वाचाळ| म्हणे मी पाषांडी तोंडाळ |
म्हणे मी कुबुद्धि कुटीळ| या नांव मुमुक्ष ||३२||
म्हणे मी कांहींच नेणे| म्हणे मी सकळाहूनि उणें |
आपलीं वर्णी कुलक्षणें| या नांव मुमुक्ष ||३३||
म्हणे मी अनाधिकारी| म्हणे मी कुश्चिळ अघोरी |
म्हणे मी नीच नानापरी| या नांव मुमुक्ष ||३४||
म्हणे मी काये आपस्वार्थी| म्हणे मी काये अनर्थी |
म्हणे मी नव्हे परमार्थी| या नांव मुमुक्ष ||३५||
म्हणे मी अवगुणाची रासी| म्हणे मी वेर्थ आलों जन्मासी |
म्हणे मी भार जालों भूमीसी| या नांव मुमुक्ष ||३६||
आपणास निंदी सावकास| पोटीं संसाराचा त्रास |
धरी सत्संगाचा हव्यास| या नांव मुमुक्ष ||३७||
नाना तीर्थे धुंडाळिलीं| शमदमादि साधनें केलीं |
नाना ग्रन्थांतरें पाहिलीं| शोधूनियां ||३८||
तेणें नव्हे समाधान| वाटे अवघाच अनुमान |
म्हणे रिघों संतांस शरण| या नांव मुमुक्ष ||३९||
देहाभिमान कुळाभिमान| द्रव्याभिमान नानाभिमान |
सांडूनि, संतचरणीं अनन्य- | या नांव मुमुक्ष ||४०||
अहंता सांडूनि दूरी| आपणास निंदी नानापरी |
मोक्षाची अपेक्षा करी| या नांव मुमुक्ष ||४१||
ज्याचें थोरपण लाजे| जो परमार्थाकारणें झिजे |
संतापाईं विश्वास उपजे| या नांव मुमुक्ष ||४२||
स्वार्थ सांडून प्रपंचाचा| हव्यास धरिला परमार्थाचा |
अंकित होईन सज्जनाचा| म्हणे तो मुमुक्ष ||४३||
ऐसा मुमुक्ष जाणिजे| संकेतचिन्हें वोळखिजे |
पुढें श्रोतीं अवधान दीजे| साधकलक्षणीं ||४४||
इति श्रीदासबोधे गुरुशिष्यसंवादे मुमुक्षलक्षणनाम
समास आठवा ||८||५. ८
समास नववा : साधकनिरूपण
||श्रीराम ||
मागां मुमुक्षाचें लक्षण| संकेतें केलें कथन |
आतां परिसा सावधान| साधक तो कैसा ||१||
अवगुणाचा करूनि त्याग| जेणें धरिला संतसंग |
तयासि बोलिजे मग| साधक ऐसा ||२||
जो संतांसि शरण गेला| संतजनीं आश्वासिला |
मग तो साधक बोलिला| ग्रन्थांतरीं ||३||
उपदेशिलें आत्मज्ञान| तुटलें संसारबंधन |
दृढतेकारणें करी साधन| या नांव साधक ||४||
धरी श्रवणाची आवडी| अद्वैतनिरूपणाची गोडी |
मननें अर्थांतर काढी| या नांव साधक ||५||
होतां सारासार विचार| ऐके होऊनि तत्पर |
संदेह छेदूनि, दृढोत्तर- | आत्मज्ञान पाहे ||६||
नाना संदेहनिवृत्ती- | व्हावया, धरी सत्संगती |
आत्मशास्त्रगुरुप्रचीती| ऐक्यतेसी आणी ||७||
देहबुद्धि विवेकें वारी| आत्मबुद्धि सदृढ धरी |
श्रवण मन केलेंचि करी| या नांव साधक ||८||
विसंचूनि दृश्यभान| दृढ धरी आत्मज्ञान |
विचारें राखे समाधान| या नांव साधक ||९||
तोडूनि द्वैताची उपाधी| अद्वैत वस्तु साधनें साधी |
लावी ऐक्यतेची समाधी| या नांव साधक ||१०||
आत्मज्ञान जीर्ण जर्जर| त्याचा करी जीर्णोद्धार |
विवेकें पावे पैलपार| या नांव साधक ||११||
उत्तमें साधूचीं लक्षणें| आंगिकारी निरूपणें |
बळेंचि स्वरूपाकार होणें| या नांव साधक ||१२||
असत्क्रिया ते सोडिली| आणी सत्क्रिया ते वाढविली |
स्वरूपस्थिती बळावली| या नांव साधक ||१३||
अवगुण त्यागी दिवसेंदिवस| करी उत्तम गुणाचा अभ्यास |
स्वरूपीं लावी निजध्यास| या नांव साधक ||१४||
दृढ निश्चयाचेनि बळें| दृश्य असतांच नाडळे |
सदा स्वरूपीं मिसळे| या नांव साधक ||१५||
प्रत्यक्ष माया अलक्ष करी| अलक्ष वस्तु लक्षी अंतरीं |
आत्मस्थितीची धारणा धरी| या नांव साधक ||१६||
जें या जनासि चोरलें| मनास न वचे अनुमानलें |
तेंचि जेणें दृढ केलें| या नांव साधक ||१७||
जें बोलतांचि वाचा धरी| जें पाहातांचि अंध करी |
तें साधी नाना परी| या नांव साधक ||१८||
जें साधूं जाता साधवेना| जें लक्षूं जातां लक्षवेना |
तेंचि अनुभवें आणी मना| या नांव साधक ||१९||
जेथें मनचि मावळे| जेथे तर्कचि पांगुळे |
तेंचि अनुभवा आणी बळें| या नांव साधक ||२०||
स्वानुभवाचेनि योगें| वस्तु साधी लागवेगें |
तेंचि वस्तु होये आंगें| या नांव साधक ||२१||
अनुभवाचीं आंगें जाणे| योगियांचे खुणे बाणे |
कांहींच नहोन असणें| या नांव साधक ||२२||
परती सारून उपाधी| असाध्य वस्तु साधनें साधी |
स्वरूपीं करी दृढ बुद्धी| या नांव साधक ||२३||
देवाभक्ताचें मूळ| शोधून पाहे सकळ |
साध्यचि होये तत्काळ| या नांव साधक ||२४||
विवेकबळें गुप्त जाला| आपेंआप मावळला |
दिसतो, परी देखिला| नाहींच कोणीं ||२५||
मीपण मागें सांडिलें| स्वयें आपणास धुंडिलें |
तुर्येसहि वोलांडिलें| या नांव साधक ||२६||
पुढें उन्मनीचा सेवटीं| आपली आपण अखंड भेटी |
अखंड अनुभवीं ज्याची दृष्टी| या नांव साधक ||२७||
द्वैताचा तटका तोडिला| भासाचा भास मोडिला |
देहीं असोनि विदेह जाला| या नांव साधक ||२८||
जयास अखंड स्वरूपस्थिती| नाहीं देहाची अहंकृती |
सकळ संदेहनिवृत्ती| या नांव साधक ||२९||
पंचभूतांचा विस्तार| जयासि वाटे स्वप्नाकार |
निर्गुणीं जयाचा निर्धार| या नांव साधक ||३०||
स्वप्नीं भये जें वाटलें| तें जागृतास नाहीं आलें |
सकळ मिथ्या निर्धारिलें| या नांव साधक ||३१||
मायेचें जें प्रत्यक्षपण| जनास वाटे हें प्रमाण |
स्वानुभवें अप्रमाण| साधकें केलें ||३२||
निद्रा सांडूनि चेइरा जाला| तो स्वप्नभयापासून सुटला |
माया सांडून तैसा गेला| साधक स्वरूपीं ||३३||
ऐसि अंतरस्थिती बाणली| बाह्य निस्पृहता अवलंबिली |
संसारौपाधी त्यागिली| या नांव साधक ||३४||
कामापासूनि सुटला| क्रोधापासूनि पळाला |
मद मत्सर सांडिला| येकीकडे ||३५||
कुळाभिमानासि सांडिलें| लोकलाजेस लाजविलें |
परमार्थास माजविलें| विरक्तिबळें ||३६||
अविद्येपासूनि फडकला| प्रपञ्चापासूनि निष्टला |
लोभाचे हातींचा गेला| अकस्मात ||३७||
थोरपणासि पाडिलें| वैभवासि लाथाडिलें |
महत्वासि झिंजाडिलें| विरक्तिबळें ||३८||
भेदाचा मडगा मोडिला| अहंकार झोडूनि पाडिला |
पाईं धरूनि आपटिला| संदेहशत्रू ||३९||
विकल्पाचा केला वधू| थापें मारिला भवसिंधू |
सकळ भूतांचा विरोधू| तोडूनि टाकिला ||४०||
भवभयासि भडकाविलें| काळाचें टांगें मोडिलें |
मस्तक हाणोनि फोडिलें| जन्ममृत्याचें ||४१||
देह समंधावरी लोटला| संकल्पावरी उठावला |
कल्पनेचा घात केला| अकस्मात ||४२||
अपधाकासि ताडिलें| लिंगदेहासि विभांडिलें |
पाषांडासि पछाडिलें| विवेकबळें ||४३||
गर्वावरी गर्व केला| स्वार्थ अनर्थीं घातला |
अनर्थ तोही निर्दाळिला| नीतिन्यायें ||४४||
मोहासि मध्येंचि तोडिलें| दुःखासि दुःधडचि केलें |
शोकासि खंडून सांडिलें| एकीकडे ||४५||
द्वेष केला देशधडी| अभावाची घेतली नरडी |
धाकें उदर तडाडी| कुतर्काचे ||४६||
ज्ञानें विवेक माजला| तेणें निश्चयो बळावला |
अवगुणांचा संव्हार केला| वैराग्यबळें ||४७||
अधर्मास स्वधर्में लुटिलें| कुकर्मासि सत्कर्में झुगटिलें |
लांटुन वाटा लाविलें| विचारें अविचारासी ||४८||
तिरस्कार तो चिरडिला| द्वेष खिरडूनि सांडिला |
विषाद अविषादें घातला| पायांतळीं ||४९||
कोपावरी घालणें घातलें| कापट्य अन्तरीं कुटिलें |
सख्य आपुलें मानिलें| विश्वजनीं ||५०||
प्रवृत्तीचा केला त्याग| सुहृदांचा सोडिला संग |
निवृत्तिपंथें ज्ञानयोग| साधिता जाहला ||५१||
विषयमैंदासि सिंतरिलें| कुविद्येसी वेढा लाविलें |
आपणास सोडविलें| आप्ततस्करांपासूनी ||५२||
पराधीनतेवरी कोपला| ममतेवरी संतापला |
दुराशेचा त्याग केला| येकायेकीं ||५३||
स्वरूपीं घातलें मना| यातनेसि केली यातना |
साक्षेप आणि प्रेत्ना| प्रतिष्ठिलें ||५४||
अभ्यासाचा संग धरिला| साक्षपासरिसा निघाला |
प्रेत्न सांगातीं घेतला| साधनपंथें ||५५||
सावध दक्ष तो साधक| पाहे नित्यानित्यविवेक |
संग त्यागूनि एक| सत्संग धरी ||५६||
बळेंचि सारिला संसार| विवेकें टाकिला जोजार |
शुद्धाचारें अनाचार| भ्रष्टविला ||५७||
विसरास विसरला| आळसाचा आळस केला |
सावध नाहीं दुश्चित्त झाला| दुश्चित्तपणासी ||५८||
आतां असो हें बोलणें| अवगुण सांडी निरूपणें |
तो साधक ऐसा येणें- | प्रमाणें बुझावा ||५९||
बळेंचि अवघा त्याग कीजे| म्हणोनि साधक बोलिजे |
आतां सिद्ध तोचि जाणिजे| पुढिले समासीं ||६०||
येथें संशयो उठिला| निस्पृह तोचि साधक जाहला |
त्याग न घडे संसारिकाला| तरि तो साधक नव्हे कीं ||६१||
ऐसें श्रोतयाचें उत्तर| त्याचें कैसें प्रत्युत्तर |
पुढिले समासीं तत्पर| होऊनि ऐका ||६२||
इति श्रीदासबोधे गुरुशिष्यसंवादे
साधकलक्षणनिरूपण नाम समास नववा ||९||५. ९
समास दहावा : सिद्धलक्षण निरूपण
||श्रीराम ||
मागां बोलिला संसारिक| त्यागेंविण नव्हे कीं साधक |
ऐका याचा विवेक| ऐसा असे ||१||
सन्मार्ग तोचि जीवीं धरणें| अन्मार्गाचा त्याग करणें |
संसारिका त्याग येणें| प्रकारें ऐसा ||२||
कुबुद्धित्यागेंविण कांहीं| सुबुद्धि लागणार नाहीं |
संसारिकां त्याग पाहीं| ऐसा असे ||३||
प्रपंचीं वीट मानिला| मनें विषयेत्याग केला |
तरीच पुढें अवलंबिला| परमार्थमार्ग ||४||
त्याग घडे अभावाचा| त्याग घडे संशयाचा |
त्याग घडे अज्ञानाचा| शनै शनै ||५||
ऐसा सूक्ष्म अंतर्त्याग| उभयतांस घडे सांग |
निस्पृहास बाह्य त्याग| विशेष आहे ||६||
संसारिका ठाईं ठाईं| बाह्य त्याग घडे कांहीं |
नित्य नेम श्रवण नाहीं| त्यागेंविण ||७||
फिटली आशंका स्वभावें| त्यागेंविण साधक नव्हे |
पुढें कथेचा अन्वय| सावध ऐका ||८||
मागां झालें निरूपण| साधकाची ओळखण |
आतां सांगिजेल खूण| सिद्धलक्षणाची ||९||
साधु वस्तु होऊनि ठेला| संशयें ब्रह्मांडाबाहेरी गेला |
निश्चयें चळेना ऐसा झाला| या नांव सिद्ध ||१०||
बद्धपणाचे अवगुण| मुमुक्षुपणीं नाहीं जाण |
मुमुक्षुपणाचें लक्षण| साधकपणीं नाहीं ||११||
साधकासि संदेहवृत्ति| पुढें होतसे निवृत्ती |
या कारणें निःसंदेह श्रोतीं| साधु वोळखावा ||१२||
संशयरहित ज्ञान| तेंचि साधूचें लक्षण |
सिद्धाआंगीं संशयो हीन| लागेल कैसा ||१३||
कर्ममार्ग संशयें भरला| साधनीं संशय कालवला |
सर्वांमध्यें संशयो भरला| साधु तो निःसंदेह ||१४||
संशयाचें ज्ञान खोटें| संशयाचें वैराग्य पोरटें |
संशयाचें भजन वोखटें| निर्फळ होय ||१५||
व्यर्थ संशयाचा देव| व्यर्थ संशयाचा भाव |
व्यर्थ संशयाचा स्वभाव| सर्व कांही ||१६||
व्यर्थ संशयाचें व्रत| व्यर्थ संशयाचें तीर्थ |
व्यर्थ संशयाचा परमार्थ| निश्चयेंवीण ||१७||
व्यर्थ संशयाची भक्ती| व्यर्थ संशयाची प्रीती |
व्यर्थ संशयाची संगती| संशयो वाढवी ||१८||
व्यर्थ संशयाचें जिणें| व्यर्थ संशयाचें धरणें |
व्यर्थ संशयाचें करणें| सर्व कांहीं ||१९||
व्यर्थ संशयाची पोथी| व्यर्थ संशयाची व्युत्पत्ती |
व्यर्थ संशयाची गती| निश्चयेंविण ||२०||
व्यर्थ संशयाचा दक्ष| व्यर्थ संशयाचा पक्ष |
व्यर्थ संशयाचा मोक्ष| होणार नाहीं ||२१||
व्यर्थ संशयाचा संत| व्यर्थ संशयाचा पंडित |
व्यर्थ संशयाचा बहुश्रुत| निश्चयेंविण ||२२||
व्यर्थ संशयाची श्रेष्ठता| व्यर्थ संशयाची व्युत्पन्नता |
व्यर्थ संशयाचा ज्ञाता| निश्चयेंविण ||२३||
निश्चयेंविण सर्व कांहीं| अणुमात्र तें प्रमाण नाहीं |
व्यर्थचि पडिले प्रवाहीं| संदेहाचे ||२४||
निश्चयेंविण जें बोलणें| तें अवघेंचि कंटाळवाणें |
बाष्कळ बोलिजे वाचाळपणें| निरर्थक ||२५||
असो निश्चयेंविण जे वल्गना| ते अवघीच विटंबना |
संशयें काहीं समाधाना| उरी नाहीं ||२६||
म्हणोनि संदेहरहित ज्ञान| निश्चयाचें समाधान |
तेंचि सिद्धाचें लक्षण| निश्चयेंसीं ||२७||
तंव श्रोता करी प्रश्न| निश्चय करावा कवण |
मुख्य निश्चयाचें लक्षण| मज निरूपावें ||२८||
ऐक निश्चय तो ऐसा| मुख्य देव आहे कैसा |
नाना देवांचा वळसा| करूंचि नये ||२९||
जेणें निर्मिलें सचराचर| त्याचा करावा विचार |
शुद्ध विवेकें परमेश्वर| ओळखावा ||३०||
मुख्य देव तो कोण| भक्तांचें कैसें लक्षण |
असत्य सांडून वोळखण| सत्याची धरावी ||३१||
आपुल्या देवास वोळखावें| मग मी कोण हें पहावें |
संग त्यागून रहावें| वस्तुरूप ||३२||
तोडावा बंधनाचा संशयो| करावा मोक्षाचा निश्चयो |
पहावा भूतांचा अन्वयो| वितिरेकेंसीं ||३३||
पूर्वपक्षें सिद्धांत| पहावा प्रकृतीचा अंत |
मग पावावा निवांत| निश्चयो देवाचा ||३४||
देहाचेनि योगें संशयो| करी समाधानाचा क्षयो |
चळों नेदावा निश्चयो| आत्मत्वाचा ||३५||
सिद्ध असतां आत्मज्ञान| संदेह वाढवी देहाभिमान |
याकारणें समाधान| आत्मनिश्चयें राखावें ||३६||
आठवतां देहबुद्धी| उडे विवेकाची शुद्धी |
याकारणें आत्मबुद्धी| सदृढ करावी ||३७||
आत्मबुद्धी निश्चयाची| तेचि दशा मोक्षश्रीची |
अहमात्मा हें कधींची| विसरों नये ||३८||
निरोपिलें निश्चयाचें लक्षण| परी हें न कळे सत्संगेंविण |
संतांसी गेलिया शरण| संशये तुटती ||३९||
आतां असो हें बोलणें| ऐका सिद्धाचीं लक्षणें |
मुख्य निःसंदेहपणें| सिद्ध बोलिजे ||४०||
सिद्धस्वरूपीं नाहीं देहो| तेथें कैंचा हो संदेहो |
याकारणें सिद्ध पाहो| निःसंदेही ||४१||
देहसमंधाचेनि गुणें| लक्षणासि काये उणें |
देहातीतांचीं लक्षणें| काय म्हणोनि सांगावीं ||४२||
जें लक्षवेना चक्षूंसी| त्याचीं लक्षणें सांगावीं कैसीं |
निर्मळ वस्तु सिद्ध त्यासी| लक्षणें कैंसीं ||४३||
लक्षणें म्हणिजे केवळ गुण| वस्तु ठाईंची निर्गुण |
तेंचि सिद्धांचें लक्षण| वस्तुरूप ||४४||
तथापि ज्ञानदशकीं बोलिलें| म्हणोनि वक्तृत्व आटोपिलें |
न्यून पूर्ण क्षमा केलें| पाहिजे श्रोतीं ||४५||
इति श्रीदासबोधे गुरुशिष्यसंवादे
सिद्धलक्षणनिरूपणनाम समास दहावा ||१०||५. १०
||दशक पाचवा समाप्त ||
Proofread by Vishwas Bhide and Sunder Hattangadi.
%@@1
% File name : dAsabodh05.itx
%--------------------------------------------
% Text title : Dasabodh dAsabodha
% Author : Swami Samartha Ramadas
% Language : Marathi, Sanskrit
% Subject : philosophy/hinduism/religion
% Description/comments :
% Transliterated by : Vishwas Bhide vishwas_bhide@yahoo.com, santsahitya@yahoo.co.in Sunder Hattangadi sunderh@hotmail.com, NA
% Proofread by : Vishwas Bhide vishwas_bhide@yahoo.com, santsahitya@yahoo.co.in, Sunder Hattangadi sunderh@hotmail.com, NA
% Latest update : May 16, 2009
% Send corrections to : sanskrit@cheerful.com
%
% Special Instructions:
% i1h.hdr,ijag.inc,itrans.sty,multicol.sty,iarticle.sty
% Transliteration scheme: ITRANS 5.2
% Site access :
% http://sanskritdocuments.org/
% http://sanskrit.gde.to/
%-----------------------------------------------------
% The text is to be used for personal studies and research only.
% Any use for commercial purpose is prohibited as a 'gentleman's'
% agreement.
% @@2
%
% Commands upto engtitle are
% needed for devanaagarii output and formatting.
%--------------------------------------------------------
This page uses Unicode utf-8 encoding for devanagari. Please set the fonts and
languages setting in your web browser to display the correct Unicode font.
Some help is available at Notes
on Viewing and Creating Devanagari Documents with Unicode Support.
Some of the Unicode fonts for Devanagari are linked at http://devanaagarii.net and for
Sanskrit Transliteration/Diacritics are available at IndUni
Fonts.
Questions, comments? Write to sanskrit@cheerful.com .